Ghazal

जिधर का रुख

जिधर का रुख करें इन फ़िज़ाओं को साथ रख लेना इन फ़िज़ाओं में बसी अपनी साँसों को साथ रख लेना वक़्त मिलता कहाँ कभी खुद से रुबरूं होने का कभी हाथों में तुम एक टूटा आईना रख लेना ज़िंदगी के खेल में कभी शह मिली कभी मात हुई इन हिसाबों को दबाकर तुम किताबों में रख लेना अपना सा लगता है कोई आसमा से टूटा हुआ तारा अपने आगोश में तुम बचपन के टूटे खिलोने रख लेना ज़ंग मैदान की हो या अपने अंदर ,बस बुरी होती है अपने अंदर ही... »

खौफ आईने का

खौफ आईने का हर शक्ल पर भारी है हर शक्ल आईने के सामने आकर बिखर जाती है कुछ तो रहस्य छिपा है आईने में शक्ल जो सिहर जाती है आईने को तोड़ के देखा शक्लों में शक्ल बस नज़र आती है सच के पीछे का सच, झूठ की ईमारत का खंडहर है हर झूठ अपना ही बुना कोई आडम्बर है चुभता आईना अपने ही अंदर का कोई घर है चिंतन पे लगे है दरवाज़े पर खुलते नहीं जेहन में आते है सब पर मन मिलते नहीं सहमे से सच दम तोड़ते पर चीखते नहीं खौफ आईने... »

मुसाफिर अपनी राह

मुसाफिर अपनी राह से भटक रहा है मृग जाने किस चाह से भटक रहा है रहस्य दर्पण में नहीं आकृति में नहीं दर्पण किस गुनाह से भटक रहा है किस सत्य की खोज में मन व्याकुल कोई फ़कीर दरगाह से भटक रहा है अदृश्य विलक्षण तरंगे घूमती तेरे अंदर मानव फिर किस चाह से भटक रहा है मोह तेरा कवच के चक्रव्यूह में फंसा मन कवच की दाह से भटक रहा है राजेश’अरमान’ »

जो अब न रहा

ज़िक्र तिरी वफ़ा का मसला था , जो अब न रहा मैं कब तिरी आँखों में बसा था, जो अब न रहा इक बुतखाने की तिश्नगी से बढ़कर कुछ नहीं कभी बुलंद जमाना मैं था ,जो अब न रहा मेरी आवाज़ह भला क्यों करता ये तेरा शहर मैं इक मिसाल हुआ करता था ,जो अब न रहा हवाओं के रहमोकरम पर जलता मैं कोई चराग हूँ खौफ बुझने का अक्सर होता था, जो अब न रहा नब्ज़ भी कुछ तेज थी ,फ़िज़ां भी थी कुछ बीमार वो तेरे मौसम का इक ज़ख्म था ,जो अब न रहा अप... »

गुज़ारिश गुज़ारिश

गुज़ारिश गुज़ारिश गुम हुआ अपने शहर की गलिओं मेँ अपना साया है मैंने भी कब अपने शहर का कोई क़र्ज़ चुकाया है अब तो हो गए वो रास्ते भी किसी अजनबी से जिन रास्तों ने कभी तुमको चलना सिखाया है उम्र गुजरी है गैर लोगों को अपना बनाते हुए अपने लहू को मगर मैंने ही ठुकराया है ताउम्र ढूंढ़ता रहा अक्स अपना अजनबी शहर में मैंने खुद अपने हाथों से शहर अपना दफनाया है माना ख्वाइशों का जुनूँ हर एहसास पे भारी है तेरी खवाइश ने... »

जो यादों में बसा है

जो यादों में बसा है ,उसे वहीँ रहने दो मेरी दी हुई हिचकिओं में, उसे रहने दो आज साकी तू रुख से पर्दा नहीं नक़ाब उठा मैखाने के बातें बस मयखानों तक रहने दो किसने देखे है कितने ज़माने हिसाब न कर मेरे ज़ख्मों के जमाने बस साथ रहने दो कोई पूछे सबब फिर तन्हाई का तो कह देना मेरी तन्हाई मेरी दवा है जिसे बस रहने दो मुद्दत हुई कोई नया गम न पा सके ‘अरमान’ अपने ज़ख्मों के खजाने , यूँ न पड़ा रहने दो राजेश&... »

nazm

कोई शाम फिर रात की बाँहों में दम तोड़ गई रात भर वो शाम दरवाज़े पे देती रही दस्तक कुछ धुँधले से साये करीब आकर छूते तो है अपना पता पूछते है मुझ अजनबी से कोई लफ्ज फिर गुमसुम है होठों पर फिर कोई सदा टकराई है कानों में चौंकते दिन की शक्ल में रात फिरती है कई रातें बिखर जाती है छोटी छोटी रातों में कहीं कुछ सहमे हुए मैं बिखरे है भीड़ में और तलाश है अपने ही किसी टुकड़े की हाथ की रेखाओं सा बना कुछ जाल अंदर से झ... »

तेरे सायें से लिपटना मेरी आदत भी नहीं

तेरे सायें से लिपटना मेरी आदत भी नहीं प्यार तो दूर बहुत मैं तेरी नफरत भी नहीं क्या दबा रखा है अंदर किसी खंजर की तरह अब मरासिम न सही मगर ऐसी अदावत भी नहीं ज़ख्म गीले है अपने कहीं तो निशां रहेंगे लेकिन दिल में इक शोर है मगर ऐसी बगावत भी नहीं अपने अंदर हूँ खुद किसी अजनबी की तरह जान पहचान की मगर कोई फुर्सत भी नहीं यूँ तो मिलते है सभी अपने ही सायों की तरह हाथ तो बढ़ते है मगर ऐसी कुर्बत भी नहीं राजेश R... »

ग़ज़ल

ग़ज़ल : अनुपम त्रिपाठी इक शख्स कभी शहर से ; पहुँचा था गाँव में । अब रास्ते सब गाँव के ; जाते हैं शहर को ।। खेत–फ़सल–मौसम ; खलिहान हैं उदास । ग़मगीन चुभे पनघट ; हर सूनी नज़र को ।। कुम्हलाने लगे ” चाँद” ये; घूंघट की ओट में । पायल से पूछें चूडियाँ ; कब आयेंगे घर ” वो ” ।। बेटा निढाल हो के ; हर रोज पूंछे माँ से । क्यूं छोड़ गया बापू ? इस गाँव को– घर को ।। गाँव... »

मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से

मुझको मिले हैं ज़ख्म जो बेहिस जहान से फ़ुरसत में आज गिन रहा हूँ इत्मिनान से आँगन तेरी आँखों का, न हो जाये कहीं तर डरता हूँ इसलिए मैं वफ़ा के बयान से साहिल पे कुछ भी न था तेरी याद के सिवा दरिया भी थम चुका था अश्क़ का उफ़ान से नज़रों से मेरी नज़रें मिलाता है हर घड़ी इकरार-ए-इश्क़ पर नहीं करता ज़ुबान से कटती है ज़िन्दगी नदीश की कुछ इस तरह हर लम्हाँ गुज़रता है नये इम्तिहान से ©® लोकेश नदीश »

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