Ghazal

उदास

पानी से भरी आखें लेकर मुझे घूरती ही रही शीशे के उस पार खड़ी लड़की उदास बहुत थी। »

जहां में चाहे गम हो या खुशी क्या

गजल : कुमार अरविन्द जहां में चाहे गम हो या खुशी क्या | मेरे मा – बैन रंजिश दोस्ती क्या | खुदा मुझको यकीं खुद पे बहुत है | तो पंडित हो या चाहे मौलवी क्या | मुहब्बत के ‘ चरागे – दिल बुझे हैं | तो जाये आज या कल जिंदगी क्या | हजारों ‘ ख्वाहिशें ‘ फीकी पड़ी हैं | मुकद्दर है नही तो फिर कमी क्या | अगर ‘ तुम छोड़ दो लड़ना तो सोचूं | गुलों की खार से होगी दोस्ती क्या | »

नादान

हर एक तनहा लम्हे में एक अर्थ ढूँढा करती थी| हर अँधेरी रुसवाई में गहरा अक्श ढूँढा करती थी | मैं मेरी परछाई में एक शख्स ढूँढा करती थी| मेरी मुझसे हुई जुदाई में कुछ वक़्त ढूँढा करती थी | लोग कहते थे की नादानी का असर है, मैं उस नादानी में भी कदर ढूँढा करती थी| »

दिल और दिमाग

यूँ तो दिल उबल रहा है, शब्दों के उबाल से | और ये कम्बखत दिमाग कहता है, अपने ज़ज्बातों को संभाल ले | »

नहीं तकदीर में जो मेरे क्यों फिर जुस्तजू करते

गजल : कुमार अरविन्द नहीं तकदीर में जो मेरे क्यों फिर जुस्तजू करते | मेरी किस्मत में क्या है वो पता जाकर के यूं करते | रखी इज्जत हमेशा है जिसने अपना समझकर तो | उसी इंसान को ऐसे नहीं बे – आबरू करते | हमें मिलने का मौका तो नही मिल पायेगा जानम | कभी ख्वाबों में आ जाओ तो जी भर गुफ़्तगू करते | ज़हर का घूंट पीकर भी बचे यदि तो बचा लेना | किसी भी हाल में साहब नहीं ‘रिश्तों का खूं करते | ये दिल का... »

Ghazal

मुहँ लटकाए आख़िर तू क्यो बैठा है इस दुनिया में जो कुछ भी है पैसा है दुख देता है घर में बेटी का होना चोर -उचक्का हो लड़का पर अच्छा है कुछ भी हो औरत की दुश्मन है औरत सच तो सच है बेशक थोड़ा कड़वा है सबकी हसरत अच्छे घर जाए बेटी लड़का कितना महगां हो पर चलता है शादी क्या है सौदा है जी चीज़ो का खर्च करेगा ज्यादा वो ही बिकता है लुटने वालो को लूटे तो क्या शिकवा आज लकी मै भी लूटूँ तो कैसा है »

Ghazal

मुहँ लटकाए आख़िर तू क्यो बैठा है इस दुनिया में जो कुछ भी है पैसा है दुख देता है घर में बेटी का होना चोर -उचक्का हो लड़का पर अच्छा है कुछ भी हो औरत की दुश्मन है औरत सच तो सच है बेशक थोड़ा कड़वा है सबकी हसरत अच्छे घर जाए बेटी लड़का कितना महगां हो पर चलता है शादी क्या है सौदा है जी चीज़ो का खर्च करेगा ज्यादा वो ही बिकता है लुटने वालो को लूटे तो क्या शिकवा आज लकी मै भी लूटूँ तो कैसा है »

कुछ न कुछ टूटने का सिलसिला आज भी ज़ारी है

कुछ न कुछ टूटने का सिलसिला आज भी ज़ारी है इस दुनिया का डर प्यार पे आज भी भारी है।। टूटकर बिखरना, बिखरकर समिटना आज भी जारी है, पर पड़ जाए ना दरार इस बात का डर आज भी भारी है। झुकना गिरना हवाओं के झोंकों से आज भी जारी है, टूट कर ना उखड़ जाऊं इस बात का डर आज भी भारी है, कहना, सुनना, लड़ना, झगड़ना उनसे आज भी जारी है, खामोश ना हो जाए वो कहीं इस बात का डर आज भी भारी है॥ बहुत कुछ कर गुजरने की कश्मकश आज भी जार... »

मुहब्बत की गली कूचों में क्या है

गजल : कुमार अरविन्द मुहब्बत की गली कूचों में क्या है | इधर देखो मेरी आँखों में क्या है | बड़ा ही जोर है उन के जुबां में | नही तो जोर जंजीरों में क्या है | ये करने वाले हैं कर जाते हैं सब | वगरना आग तकरीरों में क्या है | खुदाया दिल नही देखा कहीं पे | खुदा को पा गये ख्वाबों में क्या है | »

चले आओ मेरी आँखों का पानी देखते जाओ

गजल : कुमार अरविन्द चले आओ मेरी आंखों का पानी देखते जाओ | कहानी है तुम्हारी ही , निशानी देखते जाओ | मैं जिन्दा हूं तुम्हारे बाद भी तुमको तसल्ली हो | कफ़न सरका के मेरी बे – ज़बानी देखते जाओ | तुम्हारी बेबफाई का उतारूं आज मैं ‘ सदका | मेरी यूं ‘ ख़ाक में मिलती जवानी देखते जाओ | कहां गुजरी गुजारी जिंदगी तुमको पता कैसे | मेरे इस दर्द की पागल कहानी देखते जाओ | हमारे पैरहन से ख़ुशबुएं आती... »

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