Ghazal

“इक तारा आज फिर से टूटा बिखर गया”

इक तारा आज फिर से टूटा बिखर गया। आसमान ने ये देखा वो फिर सिहर गया।। , किसकी है ये खता की वो छोड़ आया घर। या खुद की ही वजह से वो यूँ बिखर गया।। , जब मंजिल ही नहीं फिर क्या थी जुस्तजू। किसकी तलब में राही था लाखों शहर गया।। , लो माना की आदमी को मुश्किल है मंजिले। पर जिसनें खाई ठोकरें आखिर निखर गया।। , तेरे शहर में हूँ मैं बस इतना सा ही है कसूर। हम थे काफिले में ये काफिला जिधर गया।। , मुसल्सल वक़्त की घ... »

तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है

तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है, और तू मेरे गांव को गँवार कहता है।   ऐ शहर मुझे तेरी औक़ात पता है, तू बच्ची को भी हुस्न ए बहार कहता है।   थक गया हर शख़्स काम करते करते, तू इसे ही अमीरी का बाज़ार कहता है।   गांव चलो वक्त ही वक्त है सबके पास, तेरी सारी फ़ुर्सत तेरा इतवार कहता है।   मौन होकर फोन पर रिश्ते निभाए जा रहे हैं, तू इस मशीनी दौर को परिवार कहता है।   वो मिलने आते थे कल... »

इस क़ैद ए तन्हाई से कब रिहा होंगें हम।

इस क़ैद ए तन्हाई से कब रिहा होंगें हम। सोचा तो था की मुकम्मल जहां होंगे हम।। , रोज़ आते है ख़्याल हमकों परेशान करने। अब जितना कहेंगे उतने ही रवां होंगे हम।। , तुम फ़लक ए हुस्न हो हमसे क्या है वास्ता। हुए जो जिंदगी से रूबरू क्या फ़ना होंगे हम। , खुशियों की फ़ेहरिस्त में नहीं कही नाम मेरा। अब ग़मो से क्या कहें कोई सज़ा होंगे हम।। , हमकों मिली नहीं मंजिल इक अरसा हुआ। साहिल मुमकिन ये है गुमनाम पता होंगे हम।। ... »

ग़ज़ल-ऐ-शराब……

एक शराब की कहानी है ये एक शराबी की जुबानी है ये पीता है वो सुबह-शाम जी भर के एक शराबी की ईमानदारी है ये सुकून देती है ये बहुत दिल में जाने के बाद एक शराबी की मन की मानी है ये क्यों कोसते है अक्सर सभी इसको दुनिया में एक शराबी की दिलबर जानी है ये बहुत हँसीन पल हो जाते है इसको पीने के बाद एक शराबी ने खुले-आम बात मानी है ये Dev Kumar »

तेरे इश्क मे….

तेरे इश्क मे…….तेरे इश्क मे , तेरे इश्क मे बेबस हुए तेरे इश्क मे बेखुद हुए तेरे इश्क मे बेहद हुए दीवाने हम ! तेरे इश्क मे…….तेरे इश्क मे , तेरे इश्क के दरिया मे हम तेरे इश्क के सहरा मे हम तेरे इश्क के सावन मे हम देखो डूब गए ! तेरे इश्क मे…….तेरे इश्क मे , तेरे इश्क के कुंचो मे अब तेरे इश्क की गलियो मे अब तेरे इश्क के सायो मे अब मेरा बसेरा है ! तेरे इश्क मे…... »

“इक जमानें मे सच है शज़र हुआ था मैं”

इक जमानें मे सच है शज़र हुआ था मैं। जानें कितने परिंदों का घर हुआ था मैं।। , अपनी छाह में बच्चों को खेलता देखके। जरूर ही जमाने से बेखबर हुआ था मैं।। , मेरे सायें में बीती थी हाँ वैसे तो इक सदी। याद है की अख़बार में खबर हुआ था मैं।। , पर राह ए जिंदगी में इक मोड़ ऐसा देखा। सबने छोड़ा जब शाख़ ए बेसमर हुआ था मैं। , आखिरी वक़्त जब चली थी मुझपे आरिया। ख़ून नहीं था मुझमे पर तरबतर हुआ था मैं।। @@@@RK@@@@ »

माना तेरे काफ़िलो में शामिल नहीं हुए।

माना तेरे काफ़िलो में शामिल नहीं हुए। पर ऐसा न था की हम मंजिल नहीं हुए।। , इक उम्र गुजरी यूँ ही ख्वाबो ख्यालों में। कुछ देख न पाएं कुछ हासिल नहीं हुए।। , जिंदगी ने दी है जिंदगी तो शुक्रिया करो। क्या करें अफ़सोस हम क़ामिल नहीं हुए।। , चंद लफ़्जो में कैसे लिखें अधूरी दास्तान। यूँ कहें हम कश्ती थे जो साहिल नहीं हुए।। , जानते थे जीत के भी हार हम ही जाएंगे। इसलिए उनके कभी मुक़ाबिल नहीं हुए।। @@@@RK@@@@ »

“कब तक करोंगे यूँ बेईमानी खुद से”

कब तक करोंगे यूँ बेईमानी खुद से। मुझे छोड़कर करोगे,नादानी खुद से।। , हमारी दास्तानों को फरेब कहने वाले। लिख नहीं पाओगें ये,कहानी खुद से। , तन्हाई में मिलें है लोग जो समन्दर किनारे। उनका अश्क़ है,या है यहाँ पानी खुद से।। , हमने बसर की जिंदगी ग़मो के दरम्यान। हमें दुश्मनो से नहीं, है परेशानी खुद से।। , किताबो में हम तुमको नहीं मिलने वाले। याद करना हो तो कर लो ज़ुबानी खुद से।। , बचपन ऐसे गुजरा की जैसे लम... »

न”वो वक़्त रहा न याद है क़िस्सा कोई”

न वो वक़्त रहा न याद है क़िस्सा कोई। मेरे हिस्से में ही नहीं है मेरा हिस्सा कोई।। , ये किया है ख़िज़ाँओ ने जहाँ घर अपना। गुजरे जमानों में था यही गुलिस्ताँ कोई।। , उनसे कौन पूंछे की क्या मिला खफा होके। अपनों को छोड़ता है क्या दानिस्ता कोई।। , छोड़ दिया मेहफिलो में मैंने आना जाना। कही मिल न जाएँ शख़्स मुझे तुझसा कोई।। , ख्वाहिशों की ख़ातिर हम परेशां रहे ताउम्र। पर जाते वक़्त साथ कहाँ गया खित्ता कोई।। @@@@RK@... »

सफर फासलों का

सफ़र फासलों का है ये बड़ा दर्द भरा, गर हो मुम्किन,तो कोई और अज़ाब दो ना बड़ा नहीं देखूँगा तेरी सूरत मैं कभी, इन आँखों को कोई और पता दो ना ज़रा बातों-बातों में बनी खामोशी की दीवार है ये लफ़्ज की एक चोट से गिरा दो ना ज़रा अश्क के दरिया में हूँ डूबा, गम के शरर में दहकता और कब तक है तड़पना, ऐ मुंसिफ़ बता दो ना ज़रा रोज मरता है विनायक, तुझपे मरता हुआ कर मुकम्मल मुझको,मेरी चिता सजा दो ना ज़रा….. www.facebook... »

Page 3 of 3712345»