Ghazal

कभी ठीक से अपने ही बिछाने पर सो भी तो नही सकते

कभी ठीक से अपने ही बिछाने पर सो भी तो नही सकते, ए ज़िन्दगी महसूस तो कर सकते है पर छू भी तो नही सकते काश अब ये भी समज ले कि कोशिश नही की थी हमने, कुछ भी हो जाये लेकिन मुश्किलो से डर भी तो नही सकते आदते डाल दी है हमने यू  सबको गले लगाकर मुस्कुराने की, पता है कि हम उनके है लेकिन वो हमारे हो भी तो नही सकते चलो एक बार फिर वादा करो मिलने का,फिर से बिछड़ने का, साथ चलने का वादा करेंगे पर साथ चल भी तो नही सक... »

परिन्दा कैद से छूटा नही है

परिन्दा कैद से छूटा नही है छुडाने कोई भी आता नही है बहुत खामोश है दरिया के जैसे बहुत बेचैन है कहता नही है दिवाना बन गया है प्यार में वो वो लड़ता है मगर वैसा नही है बनाया है उसे पागल जिन्होनें वही अब कह रहे अच्छा नही है सभी लड़ रहा है ठीक है पर कोई कहदे कि वो ऐसा नही है नसीहत वक्त ने क्या खूब दी है करो वो काम जो दिखता नही है »

गुस्ताखियाँ

यूं तो अरमानों के इरादे भी परेशान हैं, पानी की बूँदें भी आँखों की बारिश से हैरान हैं| पर जनाब हमारी गुस्ताखियों की भी हद नहीं होती, ऐसी केफ़ियत में अपनी ही परछाई में सुकून ढूँढ लिया करते हैं| »

नींद

आजकल नींद सोती है मेरे बिस्तर पर, और मैं तो ख्यालों की दुनिया मैं टहलने निकल जाती हूँ| »

जीतना

मुझको मुझसे जीत कर, खुशियाँ मना रहे थे वो| शायद हारकर जीतने और जीत कर हारने के , उस एहसास से वाकिफ़ न थे वो| »

ज़मीन तुम हो

मेरी हर इक ग़ज़ल की अब तक ज़मीन तुम हो ….. मेरा अलिफ़ बे पे से चे और शीन तुम हो …. जज़्बात से बना मैं इक प्यार का नगर हूँ रहते हो इस में तुम ही इस के मकीन तुम हो ….. इन क्रीम पाउडर का एहसान क्यूँ हो लेते मैं जानता हूँ तुमको कितने हसीन तुम हो …. तुमको कोई तो समझे संसार कोई साँसे लेकिन किसी की ख़ातिर कोई मशीन तुम हो …. टूटोगे तुम कभी तो बिखरूंगा मैं ज़मीं पर कुछ और हो न हो पर... »

कवि

कवि होना भी खुदा की रहमत का ही नमूना है वरना युं अपने दर्द को शब्दों में बयां कर पाना हर किसी के बस की बात नहीं। »

उदास

पानी से भरी आखें लेकर मुझे घूरती ही रही शीशे के उस पार खड़ी लड़की उदास बहुत थी। »

जहां में चाहे गम हो या खुशी क्या

गजल : कुमार अरविन्द जहां में चाहे गम हो या खुशी क्या | मेरे मा – बैन रंजिश दोस्ती क्या | खुदा मुझको यकीं खुद पे बहुत है | तो पंडित हो या चाहे मौलवी क्या | मुहब्बत के ‘ चरागे – दिल बुझे हैं | तो जाये आज या कल जिंदगी क्या | हजारों ‘ ख्वाहिशें ‘ फीकी पड़ी हैं | मुकद्दर है नही तो फिर कमी क्या | अगर ‘ तुम छोड़ दो लड़ना तो सोचूं | गुलों की खार से होगी दोस्ती क्या | »

नादान

हर एक तनहा लम्हे में एक अर्थ ढूँढा करती थी| हर अँधेरी रुसवाई में गहरा अक्श ढूँढा करती थी | मैं मेरी परछाई में एक शख्स ढूँढा करती थी| मेरी मुझसे हुई जुदाई में कुछ वक़्त ढूँढा करती थी | लोग कहते थे की नादानी का असर है, मैं उस नादानी में भी कदर ढूँढा करती थी| »

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