Ghazal

मेरे घर में भी मुझे  पहचानने वाला ………..

मेरे घर में भी मुझे  पहचानने वाला ………..

मेरे घर में भी मुझे  पहचानने वाला बस एक शक्स हमेशा रहता है। जब मैं देखूं उसे  वो भी  आईने से  मुझे  बस देखता रहता है।   यहां इस खु़शहाली में अमीरों को नींद बस ठंडी हवा में आती है लेकिन गरीब यहां का  जीवन–भर  अपना तन  सेंकता रहता है।   किसीको तो  प्यारा  है  अपना  इमान  अपनी जान  से  भी  ज्यादा और  कोई  तो  यहां  बस  चंद पैसों खातिर  इसे  बेचता  रहता है।   अपने ज़ज़्बे के  ज़ोर से  कर  देता  है ... »

मंजिल का नज़ारा तो…………..

मंजिल का नज़ारा तो…………..

 मंजिल का नज़ारा तो अपनी पालकों तले कम ही बीता है। हमारा ज्यादा वक़्त तो बस  सफर के बहाने ही  बीता है।   किसीके  दिल  में  किसीके  खातिर  प्यार  है  कितना इस  उंचाई  को  नापने  खातिर  कहां  कोई  फीता है।   वक़्त  की  रफ्तार  को  कोई  लगातार  चुनौती दे सके क्या  इस  दुनियाँ  में  कहीं  ऐसा भी  कोई  चीता है।   वो पुराने दिन  पुरानी बातें सिर्फ इतिहास में ही रह गई इस  जमाने  में  तुम्हारे  खातिर  कहां  ... »

उम्र लग गई

ख्वाब छोटा-सा था, बस पूरा होने मे उम्र लग गईं! उसके घर का पता मालूम था , बस उसे ढूंढने मे उम्र लग गईं ! ख़त तो उसने भी लिखे थे, बस मेरा नाम लिखने मे उम्र लग गईं ! दूर तो ना थे हम एक-दूसरे से, बस नजदीकियों का अहसास होने मे उम्र लग गईं ! ख्वाब छोटा-सा था, बस पूरा होने मे उम्र लग गईं ! इंतजार तो उसे भी था मेरा, बस उसे इजहार करने मे उम्र लग गईं ! रोया तो वो भी था ऱज के मुझसे बिछड़कर, बस आँखों के पानी को... »

        ज्यादा नहीं मुझे तो बस………..

        ज्यादा नहीं मुझे तो बस………..

   ज्यादा नहीं मुझे तो बस एक  सच्चा इंसान  बना दे तूँ । एक बार नहीं चाहे हर बार सच में हर बार बना दे तूँ।   आसमां  छूने की ख्वाहिश  मेरी नहीं  मन नहीं मेरा मुझे  तो  बस  सही  दिशा  में  उड़ना सिखा दे तूँ।   गलत गति से  गलत राह पे दौड़ना  मैं नहीं चाहता मुझे  तो  सही  राह  पे  बस  चलना  सिखा दे तूँ।   सैंकड़ों बरसों के कतरे जीकर भी मेर मन नहीं भरेगा मुझे तो बस  आज़ का पूरा दिन  जीना सिखा दे तूँ।   ल... »

जिंदगी  में   मेरी   एक  अपनापन है  आज़कल….

जिंदगी  में   मेरी   एक  अपनापन है  आज़कल….

   जिंदगी  में   मेरी   एक  अपनापन है  आज़कल जेब में भले ही गोपाल ठन–ठन है  आज़कल।   साथ   देने  को   कोई  दूसरा  साथ में नहीं बस  अपना बेचारा  साफ मन है आज़कल।   तुम    जब   सुनोगे   तभी   तो  जानोगे     कि मेरी   बात  में  कितना   वज़न  है  आज़कल।   मरने  से पहले   ही   मौत   को  देखने  के   बाद जिंदगी को जिंदा कर रहा जीवन है आज़कल।   बेफिक्र  ज़माने  की  करतूतें ‘बंदा’  बता  तो दे लेकिन फिक्र उस... »

ग़ज़ल

  तेरा — मेरा इश्क पुराना लगता है । दुश्मन हमको फिर भी जमाना लगता है ॥ गुलशन – गुलशन खुशबू तेरी साँसों की । मौसम भी तेरा ही दीवाना लगता है ॥ पर्वत – पर्वत तेरा यौवन बिखरा है । हद से गुजरना कितना सुहाना लगता है ॥ इन्द्र – धनुष का बनना – बिगड़ना तेवर तेरे । मस्त निगाहों का छलका पैमाना लगता है ॥ गुजरी हयात का मैं भी इक अफ़साना हूँ । सब कहते हैं ……. मर्ज़ पुराना लगता है ॥ सांझ R... »

कइस अकेला है वह, मुझे जाने दो…….

कइस अकेला है वह, मुझे जाने दो जो किया है वादा, मुझे निभाने दो वो समां भी कितना रंगीन होगा जब मिल बैठेंगे दीवाने दो चलेंगी रात भर इस दिल की बातें और भरेंगे मय के पैमाने दो बनना चाहता है वो गवाह इस मंज़र का खैर,रोको मत उसको, अंदर आने दो अभी तो हाथ में लिया है जाम-ऐ-खुशनसीबी कुछ देर तेहरो, ज़रा इसको हलक में उतर जाने दो मुमकिन नहीं है समझना, बातें दिलो की रुको तुम, ज़रा उसको समझाने दो रोशन हो जाएगा तुम्ह... »

सको तो चलो………..

हमारे साथ कदम से कदम मिला चल सको तो चलो के इस इश्क़ में कुछ देर ठहर सको तो चलो बहुत ही हौसला चाहिए, इस दिल की निगेबानी करने को अगर तुम इसकी पहरेदारी कर सको तो चलो सफर लंबा है ज़रा, मंज़िल-ऐ-वाम तक का बे-सरो-सामान निकल सको तो चलो यादों से लवरेज़ है दिल मेरा, खता मेरी नहीं तुम इसकी हर बात समझ सको तो चलो रात की ख़ामोशी और अजीब सा सन्नाटा भी तुम इन सब से निकल सको तो चलो सफर-ऐ-आम नहीं ये, औरो की तरह खुद को ... »

वक़्त तो लगता है…….

किसी को भूल जाने मे वक़्त तो लगता है के आँखों के आंसू मिटाने में वक़्त तो लगता है जब बैठे हो चाहत-ऐ-किस्ती मे, तो सब्र करो इसको साहिल तक पहुचाने में वक़्त तो लगता है क्यों रोते हो अब अपने ही किये हुए उस काम पर गमो के दिन बिताने में वक़्त तो लगता है धीरे-धीरे भरेंगे, के ये गम और आंसू से बने है जख्म को भर जाने में वक़्त तो लगता है ए दिल ज़रा ठहर जा, ज़रा तस्सली रख किसी शहर जाने में वक़्त तो लगता है चलो मान ... »

वादा न सही मगर, एक इंसा को बचाने के लिए आ……..

वादा न सही मगर, एक इंसा को बचाने के लिए आ के एक बार मिल कर मुझ से, फिर बिछड़ जाने के लिए आ मुमकिन है अब ये होश भी साथ ने दे मेरा मुझ बेहोश पर एक चादर चढ़ाने के लिए आ कुछ तो मेरे पाक-ऐ-मोहोब्बत की जूनून को समझ के कभी तो तू भी मुझको मानाने के लिए आ जनता हू अब वो रिस्ता-ऐ-रस्म-ऐ-दिल नहीं है खैर एक नया रिश्ता ही बनाने के लिए आ किस किस को बताऊ मैँ, इस दिल के किस्से को तू मेरे लिए न सही, इस ज़माने के लिए आ... »

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