Geet

आ गया अब शीत का मौसम

आ गया अब शीत का मौसम कंपकंपी के गीत का मौसम । झील सरिता सर हैं खामोश अब न लहर में तनिक भी जोश वृक्ष की शाखें नहीं मचलें लग रहा अब है न तनिक होश धूप के संगीत का मौसम गर्मियों के मीत का मौसम उमंगों पर है कड़ा पहरा जो जहां पर है वहीं ठहरा किसलिये है भावना वेवश शीत का यह राज है गहरा शीत से है प्रीत का मौसम धूप से विपरीत का मौसम। अधर तक मन का धुँआ आता दर्द का हर छंद दोहराता चुभन की अनुभूति क्या प्यारी आ... »

आपकी छवि

सर्दियों में धूप मनको जिस तरह प्यारी लगे । आपकी छवि व्यथित मन को परम सुखकारी लगे । मौन रह.अनकही बातें , शेष कहने को रहीं । जिस जगह से भी गुजरते , आप मिल जाते वहीं । मुसकराहट मन चुराती , कल्पना हो आपकी क्या पता कब याद आएँ , याद बनजारी लगे । दर्द भी कैसा दिया है , अब दवा लगने लगा । आगमन की आस में , मन जागरण करने लगा । द्वार पलकों के न इक पल, बंद हो पाते कभी , चिर प्रतीक्षा की घड़ी , अब ,और भी भारी लग... »

Jivan me sabko kya chahiye…………….

Jivan me sabko kya chahiye…………….

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prem samandar hota hai

ऊपर से कुछ दिख न पाए , अंदर अंदर होता है गहराई में नप न पाए , प्रेम समंदर होता है लोगो ने है कितना लूटा प्रेम तो फिर भी पावन है जिसमे आंख से आंसू छलके, प्रेम वो सूंदर होता है प्रेम का देखो साधक बनकर, व्याकुल ब्यथित कबीरा है लोक लाज को त्याग के नाची , प्रेम दीवानी मीरा है बिन देखे ही बिन परखे ही करते लोग समर्पण है दिल में तक जो घाब बनादे ,पेना खंजर होता है सहज सहज सा भलापन है ,सहज है इसमें कठिनाई प... »

अवध

अब ना गाऊंगा

अब ना गाऊंगा गित तेरे यादो की. अब ना चाहुंगा प्रित तेरे सांसो की. कुछ थमा तुम्हारे हमारे बिच यादो का गुलिस्ता. जो हमसफर रुठ चुका हमारे घर से. जो चूक चुका महफिल की रंजोगम से. फिर गित ना गा पाऊंगा. महबूब तुझे गुनगुना ना पाऊंगा. अवधेश कुमार राय “अवध” »

मैं बस्तर हूँ

मैं बस्तर हूँ

दुनियाँ का कोई कानून चलता नहीं। रौशनी का दिया कोई जलता नहीं। कोशिशें अमन की दफन हो गयी हर मुद्दे पे बंदूक चलन हो गयी॥ कुछ अरसे पहले मैं गुलजार था। इस बियाबान जंगल में बहार था। आधियाँ फिर ऐसी चलने लगी। नफरतों से बस्तीयाँ जलने लगी। मैं आसरा था भोले भालों का मैं बसेरा था मेहनत वालों का। जर्रा जर्रा ये मेरा बोल रहा है दरदे दिल अपना खोल रहा है। अबूझ वनवासियों का मैं घर हूँ।। आके देखो मुझे मैं बस्तर हूँ... »

कम आंकी

मेरी बातों में बस तुम थी , मगर मेरी बात कम आंकी तेरे यारों के कुनबे में , मेरी जात कम आंकी अपने अल्फाजों से मुझे दो पल में पराया करने वाले तूने प्यार के आगे मेरी औक़ात कम आंकी ।। »

द्वय–वय–जीवन उत्कृष्ट विभूषित

हृदय–पटल पर नृत्यमय नुपुर झनक से झंकृत हूँ विस्मित मैं मधु-स्वर से विह्वल अभिराम को आह्लादित तिमिर अंतस को कर धवल— कनक–खनक करके उज्जवल सारंग–सा हो भाव प्रज्जवलित सोम–सुधा सा रुप लक्षित दृग–कामना भी छलक रही— पलक पर व्याकुलता थिरक रही विधु–विनोद–अनुराग मिश्रित गुण–प्रभा इला चंचला सुसज्जित प्रखर–सौन्दर्य अपूर्व–अनुपम आलिंगन को प्... »

||देखो क्या है हालत मेरे हिन्दूस्तान की ||

किस्मत हमारी लटक रही है जैसे पाव में पायल , भारत माँ विलख रही है जैसे दीन-दुखी घायल , जिस आँचल में पले- बढे उसमे बम- गोले फुट रहे है , एक सिरे से खुद बेटा दूसरे से दुश्मन लूट रहे है , रूह काँप उठता है देखकर हालत वर्तमान की , देखो क्या है हालत विधाता मेरे हिन्दूस्तान की| जहा सोने की चिड़िया रहती वो भारत मेरा बगीचा था , जिसको खुद ‘बिस्मिल’ ने अपने खुनो से सिंचा था , जिसने भारत माँ की सेवा... »

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