Geet

Tera peyar

Teri bo najr jo ek ham par mehrban hui ham to lela ban gaye tere chaht mai ham fakir ho gaye »

यादें

बेवजह, बेसबब सी खुशी जाने क्यों थीं? चुपके से यादें मेरे दिल में समायीं थीं, अकेले नहीं, काफ़िला संग लाईं थीं, मेरे साथ दोस्ती निभाने जो आईं थीं। दबे पाँव गुपचुप, न आहट ही की कोई, कनखियों से देखा, फिर नज़रें मिलाईं थीं। मेरा काम रोका, हर उलझन को टोका, मेरे साथ वक्त बिताने जो आईं थीं। भूले हुए किस्से, कुछ टुकड़े, कुछ हिस्से यहाँ से, वहाँ से बटोर के ले आईं थीं। हल्की सी मुस्कान को हँसी में बदल गईं मेरे... »

सरहद के पहरेदार

मीठी सी है वो हँसी तेरी, आँसू तेरा भी खा़रा है, उन उम्र-दराज़ नज़रों का तू ही तो एक सहारा है। मेंहंदी से सजी हथेली भी करती तुझको ही इशारा है, कानों में गूँजी किलकारी ने पल-पल तुझे पुकारा है। ये सारे बँधन छोड़ के तू ने रिश्ता एक निभाया है, सरहद के पहरेदार तुझे पैगा़म सरहद से आया है। जब-जब धरती माँ जलती है, संग-संग तू भी तो तपता है; सर्द बर्फ़ के सन्नाटे में मीलों-मील भी चलता है। दूर ज़मीं से, नील गगन मे... »

याद

गहरा है ये मेरा प्यार, बहना करती है इंतज़ार जा बसे तुम विदेश भैया कैसे बांधूंगी अब राखी राखी के धागों में पिरोये प्यार के मोती तेरा सुखी रहे संसार मत भूलना मेरा प्यार आया राखी का त्यौहार बहना करती है इंतज़ार -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)- »

कान्हा

प्रेम की डोरी से,यशोदा की लोरी से बंध गए नन्द किशोर छल कीन्हे बड़े कान्हा,प्यारी मईया से, बहुत प्रेम है इनको, ग्वाल औ गैया से माखन चोरी से,ब्रज की होरी से बंध गए नन्द किशोर -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)- »

देश प्रेम

मेरा देश प्रेम,मन है बेचैन कब शांति सन्देश मिलेंगे माटी से प्रेम, इसकी सुगंध में रमे हैं होऊं निहाल, जब भारत दर्श किये हैं -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)- »

साज

तुम साज दो,में स्वर मिलाऊ आवाज़ दो ,संग संग आ जाऊँ लहर लहर आभास तेरा कश्ती दो तो पार हो जाऊँ तुम साज दो,में स्वर मिलाऊ -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)- »

मेघ

उमड़ घुमड़ कर छाये घटा देखो चहुँ ओर पंख फैलाय,नाचे वन में मोर ये मधुमास है प्यारा -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)- »

सावन

अम्बर बरसे धरती भींगे नाचे श्रष्टि सारी सावन की बरखा प्यारी -विनीता श्रीवास्तव(नीरजा नीर)- »

Aazadi

“आधी रात की आज़ादी की सुबह अभी तक मिली नही थी, दीवारें कई बार हिली, बुनियादें अब तक हिली नहीं थीं , गोरों की गुलामी से निकले तो, कुछ दीमक ऐसे लिपट गये, समझ सके ना अर्थ आज़ादी का, ये शब्दों तक ही सिमट गये थे, दोष नही था गैरो का, अपनों से भारत हार गया था, आज़ादी की खुशियों को , बँटवारा ही मार गया था, मख़मल पर जो बैठे थे, वो कब फूलो के पार गये? जिस देशभक्त ने लहू बहाया, वो मरघट के संसार गये, तामस बढ़... »

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