Geet

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prem samandar hota hai

ऊपर से कुछ दिख न पाए , अंदर अंदर होता है गहराई में नप न पाए , प्रेम समंदर होता है लोगो ने है कितना लूटा प्रेम तो फिर भी पावन है जिसमे आंख से आंसू छलके, प्रेम वो सूंदर होता है प्रेम का देखो साधक बनकर, व्याकुल ब्यथित कबीरा है लोक लाज को त्याग के नाची , प्रेम दीवानी मीरा है बिन देखे ही बिन परखे ही करते लोग समर्पण है दिल में तक जो घाब बनादे ,पेना खंजर होता है सहज सहज सा भलापन है ,सहज है इसमें कठिनाई प... »

अवध

अब ना गाऊंगा

अब ना गाऊंगा गित तेरे यादो की. अब ना चाहुंगा प्रित तेरे सांसो की. कुछ थमा तुम्हारे हमारे बिच यादो का गुलिस्ता. जो हमसफर रुठ चुका हमारे घर से. जो चूक चुका महफिल की रंजोगम से. फिर गित ना गा पाऊंगा. महबूब तुझे गुनगुना ना पाऊंगा. अवधेश कुमार राय “अवध” »

मैं बस्तर हूँ

मैं बस्तर हूँ

दुनियाँ का कोई कानून चलता नहीं। रौशनी का दिया कोई जलता नहीं। कोशिशें अमन की दफन हो गयी हर मुद्दे पे बंदूक चलन हो गयी॥ कुछ अरसे पहले मैं गुलजार था। इस बियाबान जंगल में बहार था। आधियाँ फिर ऐसी चलने लगी। नफरतों से बस्तीयाँ जलने लगी। मैं आसरा था भोले भालों का मैं बसेरा था मेहनत वालों का। जर्रा जर्रा ये मेरा बोल रहा है दरदे दिल अपना खोल रहा है। अबूझ वनवासियों का मैं घर हूँ।। आके देखो मुझे मैं बस्तर हूँ... »

कम आंकी

मेरी बातों में बस तुम थी , मगर मेरी बात कम आंकी तेरे यारों के कुनबे में , मेरी जात कम आंकी अपने अल्फाजों से मुझे दो पल में पराया करने वाले तूने प्यार के आगे मेरी औक़ात कम आंकी ।। »

द्वय–वय–जीवन उत्कृष्ट विभूषित

हृदय–पटल पर नृत्यमय नुपुर झनक से झंकृत हूँ विस्मित मैं मधु-स्वर से विह्वल अभिराम को आह्लादित तिमिर अंतस को कर धवल— कनक–खनक करके उज्जवल सारंग–सा हो भाव प्रज्जवलित सोम–सुधा सा रुप लक्षित दृग–कामना भी छलक रही— पलक पर व्याकुलता थिरक रही विधु–विनोद–अनुराग मिश्रित गुण–प्रभा इला चंचला सुसज्जित प्रखर–सौन्दर्य अपूर्व–अनुपम आलिंगन को प्... »

||देखो क्या है हालत मेरे हिन्दूस्तान की ||

किस्मत हमारी लटक रही है जैसे पाव में पायल , भारत माँ विलख रही है जैसे दीन-दुखी घायल , जिस आँचल में पले- बढे उसमे बम- गोले फुट रहे है , एक सिरे से खुद बेटा दूसरे से दुश्मन लूट रहे है , रूह काँप उठता है देखकर हालत वर्तमान की , देखो क्या है हालत विधाता मेरे हिन्दूस्तान की| जहा सोने की चिड़िया रहती वो भारत मेरा बगीचा था , जिसको खुद ‘बिस्मिल’ ने अपने खुनो से सिंचा था , जिसने भारत माँ की सेवा... »

दूर-दूर का रहना…

तेरा दूर-दूर का रहना ले जाये मोर चैना तेरी रहा तकै है अंखिया ताने देती घर गालिया तेरी राह तकै हुए बरसो अब छोड़ भी कल परसो तेरी सोच मे बीती रैना मोर लोटा अब तू चैना तेरा दूर-दूर का रहना ले जाये मोर चैना ! कब तक रहु मैं ऐसे कब तक राहु मैं वैसे इक पल मे ये  सोचू इक पल मे वो सोचू तू ज्यादा है छलिया या ज्यादा है मनबसिया तेरा दूर-दूर का रहना ले जाये मोर चैना ! कभी तुझ पे दिल हारु कभी तुझ से हारु छोड़ हार ... »

चला जाऊँगा एक दिन मैं।।

चला जाऊँगा एक दिन मैं तेरी मेहफिल से उठ करके। हमारा काम ही क्या है क्या होगा अब यहाँ रुकके।। मेरी यादो को आँखों में कभी आने न तुम देना। जमाना जान जाएगा कभी रोना नहीं छुप के।। »

मैं अकेला ही चलूँगा

मैं अकेला ही चलूँगा । शीश पर तलवार मेरे, पाँव में अंगार मेरे, या काटूँ या फिर जलूँगा । मैं अकेला ही चलूँगा ।। तुम न मेरा साथ देना, हाथ में मत हाथ देना, अब सहारा भी न लूँगा । मैं अकेला ही चलूँगा ।। दीन दिखलाना नहीं है, हाथ फैलाना नहीं है, सब अभावों में पलूँगा । मैं अकेला ही चलूँगा ।। वेदना दो मैं सहूँगा, “हर्ष है”, दुख में कहूँगा, इस तरह तुमको छलूँगा । मैं अकेला ही चलूँगा ।। घाव अपने कर... »

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