हाइकु

गुज़री……..

ज़िन्दगी तो हमारी गुज़री…. मगर, गुज़र…..गुज़र…..कर गुज़री….. ……………..!!                                                   …………………D K »

हाइकु

डूबती नाव अंबर सागर में दूज का चाँद। पिघल-रहा लावा दिल अंदर आँखें क्रेटर । सिसकी हवा उड़ चल रे पंछी नीड़ पराया । यादों के मोती चली पिरोती सुई हार किसे दूँ। आसमान ने डाले तारों के हार घरों के गले। चौथ का चाँद सौत की हंसुली-सा खुभा दिल में। गया निगल एक पे एक गोटी कैरम बोर्ड। – Atul »

कविता

कविता

चलो चले … किसी नदी के किनारे किसी झरने के नीचें | जहाँ तुम कल कल बहना झर झर गिरना और… और मैं मंत्रमुग्ध हो झरनों की लहरों की अंतर्धव्नि से राग लेकर लिखता जाऊँगा | चलो चले… किसी उपवन में या कानन में ! वहाँ तुम कोयल से राग मेल करना या पपीहे के संयम को टटोलना और मैं उन संवेदनाओं की लडी अपनी कविता रूपी माला में पीरो कर तुम्हारा श्रृंगार करता रहुंगा | चलो चले… सागर के तट पर तुम ... »

कविता

” मै ही तो हूँ- तेरा अहम् ………………………….. मै ही तो हूँ तुम्हारे अंतरात्मा में रोम रोम में तुम्हारे | मैं ही बसा हूँ हर पल तुम्हारे निद्रा में जागरण में | प्रेम में घृणां में उसांसो से लेकर तुम्हारे उर्मियों तक | मैं हूँ बस मैं ही हूँ न पुर्व न पश्चात तेरा कोई था न होगा | एक मेरे सिवा तुम्हारे एहसास के परिसीमन के दायरे का कोई अंत नही. औ... »

कविता

चलो चले … किसी नदी के किनारे किसी झरने के नीचें | जहाँ तुम कल कल बहना झर झर गिरना और… और मैं मंत्रमुग्ध हो झरनों की लहरों की अंतर्धव्नि से राग लेकर लिखता जाऊँगा | चलो चले… किसी उपवन में या कानन में ! वहाँ तुम कोयल से राग मेल करना या पपीहे के संयम को टटोलना और मैं उन संवेदनाओं की लडी अपनी कविता रूपी माला में पीरो कर तुम्हारा श्रृंगार करता रहुंगा | चलो चले… सागर के तट पर तुम ... »

कविता

अब और परीक्षा नही… अब और परीक्षा नही प्रतिक्षा नही करेंगे | किया नही पर प्रीत हो गई उल्टी जग की रीत हो गई | और तितिक्षा नही वरेंगे || यह अपराध किया ईश्वर ने जिसने रचा तन मन मानव का | जिसने प्रीत और बैर बनाया ओ न सहे तो हम क्यों सहेंगे !! अब और परीक्षा नही सहेंगे प्रतिक्षा नही करेंगे | जब तक प्रीत नही थी बैरी ये कब था संसार ! इसे नही क्यों भा सकता दो पुण्य पथिक का प्यार !! हम कैसे है हम ही जा... »

कविता

” मन के मोती…” पानी के बुलबुले से माला के मोतियों से बिखरता है टूट जाता है | बनता है मन का मोती बन कर के फूट जाता है || स्वप्नों में साथियों से मिलना बिछड भी जाना ! समझा नही मै अब तक जो साथ ही सोया है ओ साथ छूट जाता है | कुछेक क्षंण में ही मन अंदर से टूट जाता है || फिर देखकर जठर भी उलझन में है फंस जाता ! आखिर ये स्वप्न में क्यों ये तथ्य है दिखाता !! जो कल्पना में पाते स्वप्नों मे... »

कविता- संवेदना

कविता- संवेदना… तू कौन है ..! तू कौन है..! संवेदना ! जो अनछुए अनदेखे पहलुओं को एकाएक होने का आभाष कराती है ! तू कौन है..! जो दूसरे की पीडा का उद्विग्नता का बोध कराती है ! तू वही तो नही … जो दूसरों की तकलिफों में आँखे नम कर जाती है ! तू वही बस वही है न ! जो बिना बोले अकारण ही मन को उदास अवशादित और हर्षादित कर जाती है ! तू वही तो नही जो विभत्सता के प्रति घृणां के रूप में अवांछनीय रूप में... »

कविता

तू कौन है ..! तू कौन है..! संवेदना ! जो अनछुए अनदेखे पहलुओं को एकाएक होने का आभाष कराती है ! तू कौन है..! जो दूसरे की पीडा का उद्विग्नता का बोध कराती है ! तू वही तो नही … जो दूसरों की तकलिफों में आँखे नम कर जाती है ! तू वही बस वही है न ! जो बिना बोले अकारण ही मन को उदास अवशादित और हर्षादित कर जाती है ! तू वही तो नही जो विभत्सता के प्रति घृणां के रूप में अवांछनीय रूप में स्वयं ही उत्पन्न हो ज... »

फूलों से सीख लो

फूल से  सीख लो यारों  जीवन  का  फलसफा,  कांटों में भी मुस्कुराने का अंदाज बयां करते हैं।                                                     जिज्ञासु  »

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