मुक्तक

मुक्तक

मैं तेरे बग़ैर तेरी तस्वीरों का क्या करूँ? मैं तड़पाती यादों की जागीरों का क्या करूँ? मैं अश्कों को पलकों में रोक सकता हूँ लेकिन- मैं दर्द की लिपटी हुई जंजीरों का क्या करूँ? मुक्तककार- #मिथिलेश_राय »

मुक्तक

मेरे दर्द को तेरा अफ़साना याद है। मेरे ज़ख्म को तेरा ठुकराना याद है। लबों को खींच लेती है पैमाने की तलब- हर शाम साक़ी को मेरा आना याद है। मुक्तककार- #मिथिलेश_राय »

वो कहती है

वो कहती है लिखा हुआ आज सुना दो मैंने सिर्फ इतना ही कहा जुबाँ लड़खड़ा जाएगी एहसास बड़े गंभीर हैं -मनीष »

न तन पर कपड़े न पैरों में चप्पल का होश होता है

न तन पर कपड़े न पैरों में चप्पल का होश होता है

न तन पर कपड़े न पैरों में चप्पल का होश होता है, ये बचपन बस अपने आप में मदहोश होता है, इच्छाओं की दूर तलक कोई चादर नहीं होती, बस माँ के आँचल में सिमटा हुआ स्वरूप् होता है।। – राही (अंजाना) »

अदब से झुकने की कला भूल गए

अदब से झुकने की कला भूल गए

अदब से झुकने की कला भूल गए, मेरे शहर के लोग अपना गुनाह भूल गए, भटकते नहीं थे रास्ता कभी जो अपना, आज अपने ही घर का पता भूल गए, महज़ चन्द पैसों की चमक की खातिर देखो, यहां अपने ही अपनों की पहचान भूल गए।। राही (अंजाना) »

खेल खेलने बैठा तो खिलाड़ी न मिला

खेल खेलने बैठा तो खिलाड़ी न मिला

खेल खेलने बैठा तो खिलाड़ी न मिला, एक बन्दर को उसका मदारी न मिला, ज़िन्दगी की बिसात में हम कुछ फंसे ऐसे, कि हमारी चालोन को कोई जबाबी न मिला।। राही (अंजाना) »

यूँ तो नज़रन्दाज़ नहीं करते लोग खामियाँ मेरी

यूँ तो नज़रन्दाज़ नहीं करते लोग खामियाँ मेरी, तो मैं भी क्यूँ दिखाऊं खुलकर उनको खूबियां मेरी, अभी सीख रहा हूँ तैरना तो हंसी बनाने दो मेरी, जब डूब कर समन्दर से निकल आऊंगा तो देखेंगे वो करामात मेरी॥ राही (अंजाना) »

कई साल बीत गये

कई साल बीत गये

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उनकी तरफ से तो

उनकी तरफ से तो इक इशारा भी ना हुआ… ऒर हम कम्बखत… उनसे इश्क़ कर बैठे हैं…. राजनंदिनी रावत »

कोई तो ऐसा मिले ‘खुदा’….

कोई तो ऐसा मिले ‘खुदा’…. जब भी तेरे दर पे आऊँ…. उसके संग ही आऊँ ! राजनंदिनी रावत-राजपूत »

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