मुक्तक

मै जब से तेरी एक तस्वीर बनाने में वयस्त हूँ

मै जब से तेरी एक तस्वीर बनाने में वयस्त हूँ

मै जब से तेरी एक तस्वीर बनाने में वयस्त हूँ, मैं तब से अपने ही ख्यालों में वयस्त हूँ, रंग तो बहुत हैं ज़माने में मगर, मैं इंद्रधनुष के रंग छुड़ाने में वयस्त हूँ, चाँद है सितारे हैं आसमाँ रौशन है मगर फिर भी, मैं अपने ही घर के जुगनू जलाने में व्यस्त हूँ।। राही (अंजाना) »

बनाकर कागज़ की कश्तियाँ

बनाकर कागज़ की कश्तियाँ

बनाकर कागज़ की कश्तियाँ पानी में बहाते नज़र आते थे, एक रोज़ मिले थे वो बच्चे जो अपने सपने बड़े बताते थे, बन्द चार दीवारों से निकलकर खुले आसमान की ठण्डी छावँ में, इतने सरल सजग जो अक्सर खुली किताब से पढ़े जाते थे।। राही (अंजाना) »

लौट आने दो उस हवा को

लौट आने दो उस हवा को गुनगुनाने दो उस हवा को वह आयी है गीत सुनाने थरथराने दो उस हवा को। अशोक बाबू माहौर »

बहुत दूर तलक जाकर भी कहीं दूर जा पाते नहीं

बहुत दूर तलक जाकर भी कहीं दूर जा पाते नहीं, परिंदे यादों के तेरी मेरे ज़हन से उड़ पाते नहीं, बनाकर जब से बैठे हैं मेरी रूह पर घरौंदा अपना, किसी जिस्म पर चैन से ये ठहर पाते नहीं।। राही (अंजाना) »

प्यार के गीत

रोज प्यार के गीत गुनगुनाए हर कोई मन , मुसीबतों को ,सबक सिखाए हर कोई मन। नाच ले ,झूम ले मस्ती भरे , मधुर तरानों पर, खुशियों की बाँहों में ,झूल जाए हर कोई मन । ^^ जानकी प्रसाद विवश^^ »

मुक्तक

कदम दर कदम मै बढाने चला हूँ। सफर जिन्दगी का सजाने चला हूँ। ज़माने की खुशियाँ जहाँ पें रखकर दौर जिन्दगी बनाने चला हूँ।। योगेन्द्र कुमार निषाद घरघोड़ा »

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