मुक्तक

दिखावे के प्यार

दिखावे के प्यार दिखावे का खुला आसमां मिला जब भी उड़ना चाहा मुझको बस नीचे का रास्ता मिला »

बिजली चले जाने पर हम

बिजली चले जाने पर हम रात चांद के तले बिताते हैं क्रंक्रीट की छत पर बैठ हम प्रकृति को कोसते हैं हवाओं से मिन्नते करते शहरों की छतों पर तपती गरमी में नई सभ्यता रचते दौड़ जाती हमारी आवेषों में बिजली कंदराओं के मानव आग की खोज में इतरा रहा था एडिषन एक बल्ब में इतना परेषान था हम उस बिजली के लिए शहरों में तपते छतों में इतिहास नहीं बने हवाओं के बहने और पानी के बरसने में हमने रूकावटे खड़ी कर दी क्रंक्रीट की ... »

हुकूमत बदल जाओ

चंद वक्त ले लो दुनिया भी बदल लो। एक एहसान करो तुम ही बदल जाओ आजकल में चीखों को सुनो फिर सोचो क्या तुम काबिल हो। एक बार तुम घर में बैठ जाओ देखों लोग कैसे बदलते हैं- जमाना। बस तुम चले जाओ देखो की कैसे बदलता है सबका जीवन तुम सब जिम्मेदार बनो तो जानो की कैसे बदलता है हुकूमत की सत्ता देखो कैसे बनते लोग तख्त तुम उलट जाओ फिर देखो बदलती नई तस्वीर। जिंदा है हम तैयार हैं बस तुम चले जाओ अबकी बार हमें बैठाओ ह... »

पहरा

ख्वाबों ख्यालों में किसी का कोई पहरा नज़र नहीं आता, जो नज़र में आता तो उसका कोई चहरा नज़र नहीं आता, घूमती गुमराह सी नज़र आती हैं जो खामोश राहें हमको, उन राहों पे ढूंढ़े से दूर तलक कोई ठहरा नज़र नहीं आता, राही अंजाना »

मुक्तक

तेरे बग़ैर तेरी तस्वीरों का क्या करूँ? मैं तेरे ख़्यालों की जंज़ीरों का क्या करूँ? अश्क़ों को छुपा लेता हूँ पलकों में लेकिन- मैं तेरे सपनों की ज़ाग़ीरों का क्या करूँ? मुक्तककार- #मिथिलेश_राय »

शिकार

शिकार करने चली थी बाज का, हुस्न के गुरूर मे ।। हँसी थामे ‘सच’ कहू … पर भी ना मिला कबुतर का ।। ~ सचिन सनसनवाल »

चाँद

छोड़ कर पीछे सबको आज चाँद को घुमाने निकला हूँ, सच कहता हूँ दोस्त मेरे आज खुद को गुमाने निकला हूँ, सोया था न जाने कब से समन्दर की बाँहों में यूँ अकेला, पिघले हुए एहसास को आज फिर जमाने को निकला हूँ, राही अंजाना »

बहोत ख़ूब

मैं बहोत खूब जानता हूँ उसे, खुद से जादा ही मानता हूँ उसे वो कहीं भी ढूढ़ता नहीं मुझको, मैं ख्वाबो में भी छानता हूँ उसे।। राही अंजाना »

मुक्तक

है परिभाषित सतत संघर्ष और संग्राम अभिनंदन। हैं हम सारे अयोध्या के निवासी, राम अभिनंदन। वो जो हर भौंकते से श्वान का मुंह वाण से भर दे। कि इस कलयुग में उस एकलव्य है नाम अभिनंदन। »

मुक्तक

मात्र श्रृंगार की ना रहे पराकाष्ठा इसमें अंगार भी चरम होना चाहिए। मात्र प्रेम और आसक्ति ना बने कविता पंक्तियों में वंदे मातरम होना चाहिए। »

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