मुक्तक

वो कहती है

वो कहती है लिखा हुआ आज सुना दो मैंने सिर्फ इतना ही कहा जुबाँ लड़खड़ा जाएगी एहसास बड़े गंभीर हैं -मनीष »

न तन पर कपड़े न पैरों में चप्पल का होश होता है

न तन पर कपड़े न पैरों में चप्पल का होश होता है

न तन पर कपड़े न पैरों में चप्पल का होश होता है, ये बचपन बस अपने आप में मदहोश होता है, इच्छाओं की दूर तलक कोई चादर नहीं होती, बस माँ के आँचल में सिमटा हुआ स्वरूप् होता है।। – राही (अंजाना) »

अदब से झुकने की कला भूल गए

अदब से झुकने की कला भूल गए

अदब से झुकने की कला भूल गए, मेरे शहर के लोग अपना गुनाह भूल गए, भटकते नहीं थे रास्ता कभी जो अपना, आज अपने ही घर का पता भूल गए, महज़ चन्द पैसों की चमक की खातिर देखो, यहां अपने ही अपनों की पहचान भूल गए।। राही (अंजाना) »

खेल खेलने बैठा तो खिलाड़ी न मिला

खेल खेलने बैठा तो खिलाड़ी न मिला

खेल खेलने बैठा तो खिलाड़ी न मिला, एक बन्दर को उसका मदारी न मिला, ज़िन्दगी की बिसात में हम कुछ फंसे ऐसे, कि हमारी चालोन को कोई जबाबी न मिला।। राही (अंजाना) »

यूँ तो नज़रन्दाज़ नहीं करते लोग खामियाँ मेरी

यूँ तो नज़रन्दाज़ नहीं करते लोग खामियाँ मेरी, तो मैं भी क्यूँ दिखाऊं खुलकर उनको खूबियां मेरी, अभी सीख रहा हूँ तैरना तो हंसी बनाने दो मेरी, जब डूब कर समन्दर से निकल आऊंगा तो देखेंगे वो करामात मेरी॥ राही (अंजाना) »

कई साल बीत गये

कई साल बीत गये

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उनकी तरफ से तो

उनकी तरफ से तो इक इशारा भी ना हुआ… ऒर हम कम्बखत… उनसे इश्क़ कर बैठे हैं…. राजनंदिनी रावत »

कोई तो ऐसा मिले ‘खुदा’….

कोई तो ऐसा मिले ‘खुदा’…. जब भी तेरे दर पे आऊँ…. उसके संग ही आऊँ ! राजनंदिनी रावत-राजपूत »

मै जब से तेरी एक तस्वीर बनाने में वयस्त हूँ

मै जब से तेरी एक तस्वीर बनाने में वयस्त हूँ

मै जब से तेरी एक तस्वीर बनाने में वयस्त हूँ, मैं तब से अपने ही ख्यालों में वयस्त हूँ, रंग तो बहुत हैं ज़माने में मगर, मैं इंद्रधनुष के रंग छुड़ाने में वयस्त हूँ, चाँद है सितारे हैं आसमाँ रौशन है मगर फिर भी, मैं अपने ही घर के जुगनू जलाने में व्यस्त हूँ।। राही (अंजाना) »

बनाकर कागज़ की कश्तियाँ

बनाकर कागज़ की कश्तियाँ

बनाकर कागज़ की कश्तियाँ पानी में बहाते नज़र आते थे, एक रोज़ मिले थे वो बच्चे जो अपने सपने बड़े बताते थे, बन्द चार दीवारों से निकलकर खुले आसमान की ठण्डी छावँ में, इतने सरल सजग जो अक्सर खुली किताब से पढ़े जाते थे।। राही (अंजाना) »

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