Hindi-Urdu Poetry

नौकरी

गुलामी का अर्थ तो तब समझ आया, जब नौकरी की कुछ दिन एक प्राइवेट कंपनी में | कहते है उसे ‘नौकरी’ क्यों, यह तो जानता था | किन्तु वह अस्तित्व में है ‘चाकरी’, यह तो अब समझ आया | समझ आया कि तलवे चाटने से है बहेतर बेकारी अपनी! चाहे जेब खाली रह जाए, कम से कम सिद्धांत दृढ रहते है | ~Bhargav Patel (अनवरत) »

तिरंगा ए शान

तिरंगा ए शान

रंग हैं विभिन्न देखो फिर भी एक नाम है, एक ही है माटी अपनी एक ही तो शान है, बीच में चक्र जो वो जीत का अभिमान है, मुठ्ठी में है बन्द जो तिरंगा अपनी जान है, रंग हैं विभिन्न देखो फिर भी एक नाम है, सरहद पर मिटने वालों की दस्तक का ये निशान है, भरे फक्र से जो छाती माँ की गर्व् और अभिमान है, ऐसी हस्ती रखता ये तिरंगा मेरा महान है, रंग हैं विभिन्न देखो फिर भी एक नाम है, दिल में और दिमाग में जो बसे वो हिन्दु... »

जीवनसमुद्र

कट जाते है दिन पैसो की झनकार सुनने के लिए | किन्तु रात आते-आते शुष्क पड़ जाता है वह जीवनरस; जिसे पीने के लिए मथते रहते है जीवनसमुद्र | -Bhargav Patel (अनवरत) »

धुँए में जीवन

धुँए में जीवन

तू जला कर मुझे धुंए के छल्ले बना कर खुश है, तो मैं भी खुश हूँ हर रोज तुझे झुलसता देख कर, तू सुलगाकर मुझे दे रहा है हर लम्हा हवा, तो मैं भी निगल रही हूँ तुझे तेरी ज़िन्दगी घुला कर।। राही (अंजाना) »

बहुत रो चुके है……..

सुकून हम अपने दिल का अब कहू चुके है हम खुद को गम-ऐ-सागर में डुबो चुके है क्यों मजबूर करते हो हमें, ये खत दिखा कर हम पहले से ही उदास है, बहुत रो चुके है………………….!! D K »

ख्याल करती,बेहाल करती……..

शुक्र है मोहोब्बत का कोई मज़हब नहीं होता वर्ना ये भी अमीरी और गरीबी का ख्याल करती मिल जाती हर शक्श-ऐ-आमिर को और हम जैसो को ये बेहाल करती……………………………!! D K »

वो मुँह छुपा-छुपा कर रोये……..

हमको तन्हाई में बुला-बुला कर रोये अपने आंसुओं को छुपा-छुपा कर रोये जब देखी उस ने हमारी सिद्क़-ऐ-दिल लोगो अपने ही आँचल में, वो मुँह छुपा-छुपा कर रोये…………….!! D K »

उसके नाम का लोगो……..

यूँ ही नहीं लबरेज़ हो रही, हमारे दिल में यादें उसकी के हमने पिया था मय-ऐ-गुल्ल-रंग उसके नाम का लोगो……………..!! D K »

निगेबानी……..

कौन कहता है कम्बक्त, के हम बे-सरो-सामान सोया करते है के रात कटती है सिर्फ, निगेबानी इस दिल-ऐ-गम की करते करते……………!! D K »

सफा-सफा रहते है……..

हमारी इस बात से भी लोग हमसे खफा रहते है के हम सब से क्यों रफा-दफा रहते है के रंग-ऐ-बईमानी जब सब पर चढ़ी है इस दुनिया में तो क्यों हम हरदम सफा-सफा रहते है…………………………..!! D K »

Page 1 of 344123»