Hindi-Urdu Poetry

हमने कलम उठाई है

फिर से आज हमने  कलम उठाई है… हाथ में फिर वही पुरानी डायरी आई है… सोच ही रहे थे कुछ नया लिखने में क्या बुराई है.. कलम से ही तो किताबो ने अपनी दुनिया सजाई है … कुछ नया उसमे जुड़ता रहे इसीलिए तो कलम बनायीं है…. कलम ने नयी दुनिया की एक नयी पहचान बनायीं है…….. लिखते तो कई है पर……. किसी की कलम ने उम्मीद की जोत जलायी है …. तो किसी की कलम  ने बस आग लगाय... »

वक़्त की हवा

वक़्त की हवा

काश दुनियाँ में ऐसी भी कोई गलती हो जिसे करने पर भी जिंदगी बेफिक्र चलती हो।   ऐसा जहां बनाने की कोशिश में हूँ जहाँ इंसानियत सिर्फ रब से डरती हो।   अरे वक़्त की उस मार से क्या डरना जो गलतफहमी को दूर करती हो।   ऐसी दौलत का मुझे क्या करना जो मुझे खुद से ही दूर करती हो।   प्रेम की परिभाषा किसी घड़े का पानी नहीं दुनियाँ भले ही ऐसा समझती हो।   वें स्कूल कैसे जाएंगे जिन्हें पेटभर रोटी भी कभी–कभार मिलत... »

मेरे भय्या

तेरे साथ जो बीता बचपन कितना सुन्दर जीवन था, ख़ूब लड़ते थे फिर हँसते थे कितना सुन्दर बचपन था, माँ जब तुझको दुलारती मेरा मन भी चिढ़ता था तू है उनके बुढ़ापे की लाठी ये मेरी समझ न आता था, स्कूल से जब तू छुट्टी करता मेरा मन भी मचलता था फिर भी मैं स्कूल को जाती ये मेरा एक मकसद था। बड़े हुए हम और बीता बचपन फिर तुझको बहना की सुध आई हुई जब विदा तेरी बहना तेरी आँखें भर आई, अब याद आता है बीता बचपन कैसे हम हम... »

मेरे घर में भी मुझे  पहचानने वाला ………..

मेरे घर में भी मुझे  पहचानने वाला ………..

मेरे घर में भी मुझे  पहचानने वाला बस एक शक्स हमेशा रहता है। जब मैं देखूं उसे  वो भी  आईने से  मुझे  बस देखता रहता है।   यहां इस खु़शहाली में अमीरों को नींद बस ठंडी हवा में आती है लेकिन गरीब यहां का  जीवन–भर  अपना तन  सेंकता रहता है।   किसीको तो  प्यारा  है  अपना  इमान  अपनी जान  से  भी  ज्यादा और  कोई  तो  यहां  बस  चंद पैसों खातिर  इसे  बेचता  रहता है।   अपने ज़ज़्बे के  ज़ोर से  कर  देता  है ... »

आयत की तरह

किसी आयत की तरह रात दिन गुनगुनाता रहा हूँ तुझे, सबकी नज़रो से बचाकर अपनी पलकों में छिपाता रहा हूँ तुझे, मेरे हर सवाल का जबाब तू ही है मगर, फिर भी एक उलझे सवाल सा सुलझाता रहा हूँ तुझे, यूँ तो बसी है तू मेरी दिल की बस्ती में, मगर फिर भी दर बदर तलाशता रहा हूँ तुझे॥ राही (अंजाना) »

बाहर निकल आया

गुजरता रहा उसकी आँखों से हर रात किसी भरम सा मैं, फिर एक रोज़ खुद ब खुद उसके ख्वाबों से बाहर निकल आया मैं, छुप कर बैठा रहा मैं एक झूठ की आड़ में बरसों, फिर एक रोज किसी सच्ची ज़ुबान सा बाहर निकल आया मैं, ईमारत ए नीव सा दबा बैठा रहा वजूद मेरा, फिर एक रोज़ किसी मस्ज़िद की अज़ान सा बाहर निकल आया मैं॥ राही (अंजाना) »

SHAYRI

है मुझे एक मर्ज़ लेकिन मुझे खौफ नहीं क्योंकि है वो मर्ज़ बेखौफी का ही। »

SHAYRI

जिंदगी से मुझे इतना कुछ मिला है इस बात पे मैं कितना खुश हो लूँ एक झटके में सबकुछ छूट जाना है तो क्या इस बात के वास्ते अभी से रो लूँ। »

मंजिल का नज़ारा तो…………..

मंजिल का नज़ारा तो…………..

 मंजिल का नज़ारा तो अपनी पालकों तले कम ही बीता है। हमारा ज्यादा वक़्त तो बस  सफर के बहाने ही  बीता है।   किसीके  दिल  में  किसीके  खातिर  प्यार  है  कितना इस  उंचाई  को  नापने  खातिर  कहां  कोई  फीता है।   वक़्त  की  रफ्तार  को  कोई  लगातार  चुनौती दे सके क्या  इस  दुनियाँ  में  कहीं  ऐसा भी  कोई  चीता है।   वो पुराने दिन  पुरानी बातें सिर्फ इतिहास में ही रह गई इस  जमाने  में  तुम्हारे  खातिर  कहां  ... »

Teri yaad

Pal bhar ka hi tha kya saath, Tum ayi aur chali gayi, Hum toh chain se tumhe dekhna chahte the, Etni bhi na samjhi  tu pagli. Etni jaldi thi ki apne balon na sawar kar, Mera tiffin pack karne lag gayi tu, Der mujhe ho rahi thi ya tujhe Kaun janey Office main kaam karne jata hun, Etna tu toh janti hain, Phir mere khabon main aakar, Mujhe kyun satati hain Teri etni addat ho gayi hain ki Aj bhi tere ... »

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