मातृ दिवस

कुछ भी नहीं छुपाता हूँ मैं माँ को सब कुछ बताता हूँ

कुछ भी नहीं छुपाता हूँ मैं माँ को सब कुछ बताता हूँ, माँ मुझ पर प्यार लुटाती है मैं सब कुछ भूल जाता हूँ, मैं भूखा जब हो जाता हूँ माँ मुझको खूब खिलाती है, पर कभी कभी माँ मेरी चुप के भूखी भी सो जाती है, मैं दूर कहीँ भी जाता हूँ माँ मुझको पास बुलाती है, मैं माँ को भूल न पाता हूँ माँ मुझको भूल न पाती है।। – राही (अंजाना) »

“माँ”

“माँ” कितनी बार धुप मे खुन को जलाई तुने “माँ” मेरी लिए चंद रोटियाँ लाने मे। कितनी बार तुने खुशी बेच ली “माँ” तुने मुझे सुलाने मे।। कितनी बार दुसरे से लड़ गई ” माँ ” मुझे बस के सीट पर बैठाने मे, कितनी बार अपनी सोना– चाँदी बेची “माँ” मुझे रोजगार दिलाने मे। कभी खुशी कभी आँसु बेची माँ मुझे घर से बाहर भेजने मे। तब पर भी ये मतलबी दुनिया त... »

आई

आई तुझ्यासाठी मी काय लिहू, आणि किती लिहू, तुझ्या महितीसाठी शब्दच अपुरे आहेत, तुझ्यासमोर सगळे जगच फिके आहे।। आई तुझ्या बद्दल बोलायला मला शब्दच उरणार नाहीत. आणि तुझे उपकार फेडायला मला हजारो जन्म पुरणार नाहीत।। आजपर्यंत तू माझा प्रत्येक हट्ट पूर्ण केला, अगदी निस्वार्थ भावनेने, तसेच माझी काळजी घेतलीस निष्ठेने. माझ्या आयुष्यातील शांतता तू, माझ्या मनातील गारवा तू, अंधाऱ्या आकाशातील चंद्र तू, माझ्या आयुष... »

दुनिया जीतकर मैं ममता हार गयी

चल पड़ी उस राह पर,जहां काटें बहुत थे| माँ, तेरी फूल जैसी गोदी से उतरकर ये काटें बहुत चुभ रहे थे| चलते हुए एक ऐसा काटा चुभा था, कि ज़ख्म से खून आज भी निकल रहा है| माँ, मंजिल पर तो पहुँच गयी हूँ, पर इसकी ख़ुशी मनाने के लिए है तू ही नहीं है| यूं तो मैं तेरी मल्लिका थी, पर मैं तुझे रानी बनाना चाहती थी| लेकिन पता नहीं था मुझे कि तेरे दिल में, मुझे पाने का फ़कीर जिंदा था| माँ, वो तेरे शब्द जो मैंने सफलता के... »

मॉ बोली लाठी से मारुँगी ।😝😝

आज मेरे पास सावन की मातृ दिवस की लिंक आई । फिर क्या इसे देखकर मुझे भी सनक आई । फिर मैने भी कलम उठाई । और पुरी महेनत से एक कविता बनाई । फिर मैने मेरी कविता सबसे पहले मॉ को सुनाई । मॉ हल्का सा मुस्काई । और बोली बेटे तेरी ये कविता तो समझ ना आई। पर तेरी ऑखो मे मेरे लिये इज्ज्त देखकर ऑखे भर आई । मॉ को रोता देख मेरी ऑखे भी भर आई । इतना देख मॉ रोना छोड अचानक गुस्से मे आई । और उसने अपने पास पडी लाठी उठाई।... »

माँ मेरी

संघर्षों में जीवन की तू परिभाषा कहलाती है, रंग बिरंगी तितली सी तू इधर उधर मंडराती है, खुद को पल- पल उलझा कर तू हर मुश्किल सुलझाती है, खुली हवा में खोल के बाहें तू मन ही मन मुस्काती है, आँखे बड़ी दिखाकर तू जब खुद बच्ची बन जाती है, मेरे ख़्वाबों को वहम नहीं तू लक्ष्य सही दिखलाती है।। जो भी मिले किरदार निभा कर दृष्टि में सबकी आती है, बस एक माँ ही है जो हर दिल की पूरी दुनियाँ कहलाती है।। राही (अंजाना) »

ममता

एक युवती जब माँ बनती है, ममता के धागों से बच्चे का भविष्य बुनती है, ज़ज्बात रंग -बिरंगे उसके, बच्चे के रंग में ढलते हैं, दिल के तारों से हो झंकृत, लोरी की हीं गूंज निकलती, माँ अल्फाज़ में जैसे हो, दुनियां उसकी सिमटती चलती , फिर क्या, नयनों में झिलमील सपने, आँचल में अमृत ले चलती , पग -पग कांटे चुनती रहती, राहों की सारी बाधाएं, दुआओं से हरती चलती, हो ममता के वशीभूत बहुत, वो जननी बन जीवन जनती है, एक यु... »

एक माँ ही तो है

एक माँ ही तो है जिसने मुझसे और मैंने उससे बिना एक दूजे को देखे बेपनाह प्रेम और साथ निभाया है। एक माँ ही तो है जिसने मेरे बिना कुछ बोले मेरी हर एक बात को समझ अपनाया है। एक माँ ही तो है जिसने हर पल मुझे सबकी बुरी नज़रों से तिलक लगाकर बचाया है। एक माँ ही तो है जिसने मुझे तपती धूप में भी भोजन बनाकर मेरा पेट भरवाया है। एक माँ ही तो है जिसने हर पल, हर क्षण मेरा साथ बिना किसी स्वार्थ निभाया है। एक माँ ही ... »

लाख अपने गिर्द हिफाजत की लकीरें खीचूँ

लाख अपने गिर्द हिफाजत की लकीरें खीचूँ, एक भी उन में नहीं “माँ ” तेरी दुआओं जैसी, लाख अपने को छिपाऊँ कितने ही पर्दों में, एक भी उन में नहीं “माँ” तेरे आँचल जैसा, लाख महगे बिस्तर पर सो जाऊँ मैं, एक भी नहीं “माँ” उनमें तेरी गोद जैसा, लाख देख लूँ आइनों में अक्स अपना, एक आइना भी नहीं “माँ” तेरी आँखों जैसा, लाख सर झुका लूँ उस मौला/भगवान के दर पर, एक दरबार ... »

कितनी दफ़ा उँगलियाँ अपनी जला दी तूने

कितनी दफ़ा उँगलियाँ अपनी जला दी तूने… ‘माँ’ मेरे लिए चंद, रोटियाँ फुलाने में ! कितनी दफ़ा रातें गवां दी, “माँ” तूने मुझे सुलाने में, कितनी दफ़ा आँचल भिगा दिया, “माँ” तूने मुझे चुपाने में, कितनी दफ़ा छुपा लिया, “माँ” बुरी नज़र से तूने मुझे बचाने में, कितनी दफ़ा बचा लिया, “माँ” गलत राह तूने मुझे जाने में, कितनी दफ़ा लुटा दिया खुद को, “... »

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