Ushesh Tripathi, Author at Saavan's Posts

कहते तो खुद को आशिक-ए-पर्वरदिगार थे,

आसमाँ तले जो बैठे हैं चाँदनी के मुन्तजिर, आपकी  जुल्फ़ों में चाँद के आसार ढ़ूढ़ते हैं!! कल तलक जो जीते थे फकीराना सी जिन्दगी, हर  ओर  आज  वो  ही  घर  द्वार   ढ़ूढ़ते  हैं!! खुद के साये से भी जो डरते थे शब-ए-श्याह, आज   आपके   साये   में   संसार   ढ़ूढ़ते  हैं!! कहते तो खुद को आशिक-ए-पर्वरदिगार थे, फिर हर सम्त छुपने को क्यों दीवार ढ़ूढ़ते हैं!! शजर जो काट देते थे बीज बोने से पहले ही, छाँव की खातिर ... »

जिन्दगी भर भटका किये राह-ए-उम्मीद में,

जिन्दगी  भर  भटका  किये  राह-ए-उम्मीद  में, कभी   पहुँच   ही  ना  पाये  दयार-ए-हबीब में, शाम  ढ़ल  गयी  और  हम  यूँ  ही  बैठे रह गये, वो आये और जा बस गये निगह-ए-अंदलीब में, क्या   खता   खुदा  की  क्या  उनकी खता थी, जब  लिख  दिये  हो  किसी  ने  ग़म-नसीब  में, जब  वो  अक्स-ए-रूख थे देख रहे मेरे रकीब में, हम पूँछते ही रह गये क्या कमीं थी मुझ गरीब में, वो आके हमसे पूछते क्या हो किसी तकलीफ में, हम  घुट... »

आ कि तुझ बिन बज्म-ए-यारों में

आ कि तुझ बिन बज्म-ए-यारों में भी घबराता हूँ मैं, अपनों  की  महफिल  में  खड़ा  गैर  हो जाता हूँ मैं, बिन  तेरे  सारा  जहाँ   नाशाद   सा   लगता   मुझे, सू-ए-मंजिल  से  दफ्अतन यूँ ही भटक जाता हूँ मैं, »

‘ना जाने क्यों उन्होंनें जिन्दगी ही नाम कर दी

मैं उनसे चन्द पल की ही तो मोहलत माँगता था, ना जानें क्यों उन्होंनें जिन्दगी ही नाम कर दी हैं, मैं सोया हूँ नहीं दिन रात जबसे देखा हैं उनको, निगाह-ए-इल्तिफातों में सुबह से शाम कर दी हैं, उसी कूचे में रहता हूँ जिधर से तुम कभी गुजरीं, हिकायतें इस कदर फैली मुझे बदनाम कर दी हैं, बज्म़ यारों की कभी लगती थी जहाँ कल तक, आज उस चौखट को मयखाने के नाम कर दी हैं, पैरहन   तक   हैं   तेरे   ही   नाम   के  अब  तो... »

“ढ़ूढ़ता हूँ”

ना  जाने  किस भँवर में हूँ इक ठिकाना ढ़ूढ़ता हूँ, जिन्दगी  जी लूँ  ज़रा  सा बस  फ़साना ढ़ूढ़ता हूँ, प्यार  की  कश्ती  में लगता डूबता ही जा रहा हूँ, मौत से मिल जाऊँ इक दिन बस बहाना ढ़ूढ़ता हूँ »

“आँखें”

मन की बात खुदा ही जानें आँखें तो दिल की सुनती हैं, जिनसे पल भर की दूरी रास नहीं उनसे ही निगाहें लड़ती हैं, दिल भँवर बीच यूँ फँस जाता साँसें भी मुअस्सर ना होतीं, आँखो आँखों के खेल में बस हर रोज सलाखें मिलती हैं, बज्म-ए-गैर में जब जब दिल-आवेज़ नज़र कोई आता हैं, बयान-ए-हूर में उनके येें आँखें ही कसीदें पढ़ती हैं, रंज-ए-गम के अय्याम यूँ ही हँसते हँसते कट जाते हैं, बिस्मिल की गफ़लत आँखें जब महफिल में न... »

ये प्यार हटा दो तुम दिल से कहीं धोखा ये दे जाये ना

ये प्यार हटा दो तुम दिल से कहीं धोखा ये दे जाये ना, कसमों वादों और बातों में कहीं रात गुज़र ये जाये ना, सच बोलूँ तो है प्यार बहुत कहीं आँखों से छलक ये जाये ना दिल से दिल की इन बातों में कहीं दिल ही बिखर ये जाये ना बड़ी देर से मैं भी मुन्तजिर हूँ बड़ी देर लगा दी आनें में, गर इतनी देर लगाओगे तो जान निकल ये जाये ना, इस रंग भरी दुनिया में तुम बेरंग नज़ारे ना देखो, इन आँखों को तो तुम ढ़क लो कहीं घायल य... »

“वतन-परस्ती”

वतन परश्ती के लिये कोई हिन्दू कोई मुसलमाँ नहीं होता , जिधर  भी  देखो  हर  वक्त  मौजूद  भगवान  नहीं होता, ज़रा नफरत की आग तो बुझाओ हर तरफ तुम्हें यही पैगाम दिखेगा, जिस  जिस  के  दिल  में  भी  तुम  झाकोगे बस हिन्दुस्तान दिखेगा, »

“ना तो इन्कार करते हैं ना ही इकरार करते हैं”

ना तो इन्कार करते हैं ना ही इकरार करते हैं, मेरी हर अताओं को सरज़द स्वीकार करते हैं, हया की तीरगी को वो नज़र से खा़क  करते हैं, भरी महफिल में भी मुझसे निगाहें चार करते हैं, मेरी हर अजाँओं को   निगाह-ए-पाक   करते हैं, मेरे हर अल़म को भी   जलाकर   ऱाख करते हैं, अहद-ए-हवादिश में भी तबस्सुम-जा़र करते हैं, मेरी   हर  सदाओं   को सुपुर्द-ए-ख़ाक करते हैं, कैद-खानें    में   ही      सही  मेरे    तिमसाल से,... »

बन्द आँखों से कुछ भी दिखाई नहीं देता

कहो कोई तो कि आज फिर से शाम हो जायें, मजबूर हूँ बन्द आँखों से कुछ भी दिखायी नहीं देता, मैं सन्नाटे में क्यों कर बोलता रहता, मेरे अल्फ़ाजों को भी क्या कोई गवाही नहीं देता, कब्ज़ा हो गया लगता इबादतगाह पर फिर से, तभी हर फरियाद पर कोई सलामी नहीं देता, अल्फाजों सा बरसोंगें या अब्रों सा थमोगें तुम, छतरी ले ही लेता हूँ कि मेरी जान का कोई दिखायी नहीं देता, रफ़्ता रफ़्ता चलो कि शहर अन्जान हैं , कौन शागिर्द... »

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