Sonit Bopche, Author at Saavan's Posts

कचरेवाली

कचरेवाली

इक कचरेवाली रोज दोपहर.. कचरे के ढेर पे आती है.. तहें टटोलती है उसकी.. जैसे गोताखोर कोई.. सागर की कोख टटोलता है.. उलटती है..पलटती है.. टूटे प्लास्टिक के टुकड़े को.. और रख लेती है थैली में.. जैसे कोई टूटे मन को.. इक संबल देकर कहता है.. ठुकराया जग ने दुःख मत कर.. ये हाथ थम ले..तर हो जा.. इक कचरेवाली रोज दोपहर.. कचरे के ढेर पे आती है.. जहाँ शहर गंदगी सूँघता.. वहाँ वही जिंदगी सूँघती.. कूड़े की संज्ञा में... »

चल अम्बर अम्बर हो लें..

चल अम्बर अम्बर हो लें.. धरती की छाती खोलें.. ख्वाबों के बीज निकालें.. इन उम्मीदों में बो लें.. सागर की सतही बोलो.. कब शांत रहा करती है.. हो नाव किनारे जब तक.. आक्रांत रहा करती है.. चल नाव उतारें इसमें.. इन लहरों के संग हो लें.. ख्वाबों के बीज निकालें.. इन उम्मीदों में बो लें.. पुरुषार्थ पराक्रम जैसा.. सरताज बना देता है.. पत्थर की पलटकर काया.. पुखराज बना देता है.. हो आज पराक्रम ऐसा.. तकदीर तराजू तौ... »

सौ सवाल करता हूँ..

सौ सवाल करता हूँ.. रोता हूँ..बिलखता हूँ.. बवाल करता हूँ.. हाँ मैं………. सौ सवाल करता हूँ.. फिर भी लाकर उसी रस्ते पे पटक देता है.. वो देकर के जिंदगी का हवाला मुझको.. और चलता हूँ उन्ही दहकते अंगारों पर.. जब तक..किसी अंगारे सा दहकने न लगूँ.. महकने न लगूँ इत्तर की खुशबू की तरह.. तपकर किसी हीरे सा चमकने न लगूँ.. फिर क्यों भला इतना मलाल करता हूँ.. रोता हूँ..बिलखता हूँ.. बवाल करता हूँ.. हाँ मैं………. सौ सवाल... »

क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो..

क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो.. क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो.. इस रिश्ते की बुनियाद हिलाने की शुरुआत तो मैंने की थी.. छुपकर तुमसे और किसी से पहले बात तो मैंने की थी.. एक भरोसा था शीशे सा जो चटकाकर तोड़ दिया था.. संदेहों के बीच तुझे जब तन्हा मैंने छोड़ दिया था.. अपना सूरज आप डुबोकर पहले रात तो मैंने की थी.. इस रिश्ते की बुनियाद हिलाने की शुरुआत तो मैंने की थी.. क्या दोष तुम्हें दूँ तुम ही कहो.. ... »

जश्न-ए-आजादी में “इन भारतीयों” को न भूलना…

यहाँ जिस्म ढकने की जद्दोजहद में… मरते हैं लाखों..कफ़न सीते सीते… जरा गौर से उनके चेहरों को देखो… हँसते हैं कैसे जहर पीते पीते… वो अपने हक से मुखातिब नहीं हैं… नहीं बात ऐसी जरा भी नहीं है… उन्हें ऐसे जीने की आदत पड़ी है… यहाँ जिन्दगी सौ बरस जीते जीते… कल देश में हर जगह जश्न होगा… वादे तुम्हारे समां बांध देंगे… मगर मुफलिसों की बड़ी भीड़ कल भी… खड़ी ही रहेगी तपन सहते सहते… -सोनित »

वो हिन्द का सपूत है..

लहू लुहान जिस्म रक्त आँख में चड़ा हुआ.. गिरा मगर झुका नहीं..पकड़ ध्वजा खड़ा हुआ.. वो सिंह सा दहाड़ता.. वो पर्वतें उखाड़ता.. जो बढ़ रहा है देख तू वो हिन्द का सपूत है.. वो दुश्मनों पे टूटता है देख काल की तरह.. ज्यों धरा पे फूटता घटा विशाल की तरह.. स्वन्त्रता के यज्ञ में वो आहुति चढ़ा हुआ.. जो जल रहा है देख तू वो हिन्द का सपूत है.. वो सोचता है कीमतों में चाहे उसकी जान हो.. मुकुटमणि स्वतंत्रता माँ भारती की श... »

|| दहेजी दानव ||

बेटा अपना अफसर है.. दफ्तर में बैठा करता है.. जी बंगला गाड़ी सबकुछ है.. पैसे भी ऐठा करता है.. पर क्या है दरअसल ऐसा है.. पैसे भी खूब लगाए हैं.. हाँ जी.. अच्छा कॉलेज सहित.. कोचिंग भी खूब कराए हैं.. प्लस थोड़ा एक्स्ट्रा खर्चा है.. हम पूरा बिल ले आए हैं.. टोटल करना तो भाग्यवान.. देखो तो कितना बनता है.. जी लगभग पच्चीस होता है.. बाकी तो माँ की ममता है.. जी एक अकेला लड़का है.. उसका कुछ एक्स्ट्रा जोड़ूँ क्या..... »

चांद..

कल फिर गया था मैं घर की छत पर उस चांद को देखने इस उम्मीद में की शायद तुम भी उस पल उसे ही निहार रही होंगी देख रही होंगी उसपर बने दाग के उस भाग को जिसे मैं देख रहा था.. आखिर.. प्यार भी अजीब हैना.. मिलने के कैसे-कैसे बहाने ढूंढ लेता है.. -सोनित »

तुम्हारी याद आती है..

हवाएँ मुस्कुराकर जब घटाओं को बुलाती है.. शजर मदहोश होते हैं..तुम्हारी याद आती है.. इन्ही आँखों का पानी फिर उतर आता है होठों तक.. भिगोकर होंठ कहता है..तुम्हारी याद आती है.. किताबें खोलने को जी नहीं करता मिरा बिल्कुल.. दबा एक फूल मिलता है..तुम्हारी याद आती है.. मैं सन्नाटों में खो जाता हूँ ये हालत है अब मेरी.. कोई पूछे तो कहता हूँ..तुम्हारी याद आती है.. कभी तू देखने तो आ तेरे मुफलिस के हुजरे में.. अ... »

ये वो कली है जो अब मुरझाने लगी है..

कश्तियाँ समंदर को ठुकराने लगी है.. तुमसे भी बगावत की बू आने लगी है.. मत पूछिए क्या शहर में चर्चा है इन दिनों.. मुर्दों की शक्ल फिर से मुस्कुराने लगी है.. मैं सोचता हूँ इन चबूतरों पे बैठ कर.. गलियाँ बदल-बदल के क्यूँ वो जाने लगी है.. गुजरे हुए उस वक़्त की बेशर्मी मिली थी कल.. वो आज की हया से भी शर्माने लगी है.. किस चीज को कहूँ अब इंसान बताओ.. ये वो कली है जो अब मुरझाने लगी है.. -सोनित »

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