Ritu Soni, Author at Saavan's Posts

स्पर्श

जीवन की पथरीली राहों पर, जब चलते-चलते थक जाऊँ, पग भटके और घबराऊँ मैं, तब करुणामयी माँ के आँचल सा स्पर्श देना, ऐ ईश मेरे । जब निराश हो, किसी मोड़ पर रूक जाऊँ, हताश हो, कुण्ठाओं के जाल से, न निकल पाऊँ मैं, तब सूर्य की सतरंगी किरणों सा, स्फूर्तिवान स्पर्श दे, श्री उमंग जगा देना, ऐ ईश मेरे। जब चंचल मन के अधीन हो, अनंत अभिलाषाओं के क्षितिज में, भ्रमण कर भरमाऊँ मैं, तब गुरु सम निश्छल ज्ञान का स्पर्श देन... »

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अब

अब ममता की छांँव और आत्मीयता को छोड़, व्यवसायिक मुकाम हासिल करने में जुटी जिंदगी । अब कुदरती हवा और चाँदनी रात के नज़ारों को भूल, वातानुकूलित कमरे और दूरभाष में जुटी जिंदगी । अब आधुनिकता की जद्दोजहद में खुशी-ग़म बाँटना भूल, अपने आप में सिमटती जिंदगी । अब भीतर से खोखली होती, दिखावटी मुखौटों से सुसज्जित होती जिंदगी। अब वात्सल्य, स्नेह, प्रेम बंधनों को तोड़, खुदगर्ज होती जिंदगी । अब मानसिक असंतुलन के... »

क्या-क्या छुपा रही थी

न जाने क्या-क्या छुपा रही थी, गर्मी की सुबह, वो शाल ओढ़े जा रही थी, धूल से पाँव सने थे,चंचल नयन बोझिल हुए थे, भूख से पेट धँसे थे,चकित हो मैं देख रही थी, मन ही मन ये पूछ रही थी, क्या यह ठंड से बचने की जुगत है या, तन ढकने को वो विवश है, कैसा अपना ये सभ्य समाज है, कोई नित्य नये परिधान बदलते, कुछ लोग वहीं टुकड़ो में ही पलते। न जाने क्या-क्या छुपा रही थी, तन पर कितने गर्द पड़े थे, उसको इसकी कहांँ फिकर ... »

क्या-क्या छुपा रही थी

न जाने क्या-क्या छुपा रही थी, गर्मी की सुबह, वो शाल ओढ़े जा रही थी, धूल से पाँव सने थे,चंचल नयन बोझिल हुए थे, भूख से पेट धँसे थे,चकित हो मैं देख रही थी, मन ही मन ये पूछ रही थी, क्या यह ठंड से बचने की जुगत है या, तन ढकने को वो विवश है, कैसा अपना ये सभ्य समाज है, कोई नित्य नये परिधान बदलते, कुछ लोग वहीं टुकड़ो में ही पलते। न जाने क्या-क्या छुपा रही थी, तन पर कितने गर्द पड़े थे, उसको इसकी कहांँ फिकर ... »

ग्रीष्म ऋतु

ग्रीष्म ऋतु की खड़ी दोपहरी, सुबह से लेकर शाम की प्रहरी, सूरज की प्रचंड किरणें, धरती को तपा रहीं हैं, फसलों को पका रहीं हैं ं, गुलमोहर की शोभा निराली, आम, लीची के बाग-बगीचे​, खग-विहग हैं उनके पीछे, माली काका गुलेल को ताने, करते बागो की रखवाली, कोयल की कूक सुहानी, कानों में रस है घोलती, गर्म हवाएंँ ,धूल और आँधी, ग्रीष्म ऋतु की हैं  ं साथी, ताल-तलैया सूख रहें हैं, बारिश की बूंँदों की आस में, जल वाष्प... »

हँस लिया करो

हँस लिया करो

https://ritusoni70ritusoni70.wordpress.com/2017/04/06 कभी यूँ हीं हँस लिया करो, उदासी का दामन छोड़, खुशियों से मिल भी लिया करो, बहुत छोटी है जिन्दगी, जीने की तमन्ना बुन भी लिया करो। कभी यूँ हीं हँस लिया करो, गुम-सुम रहना, पल-पल सहेजे, जज्बातों में बहना, ठीक नहीं है इन हालातों में रहना । कभी यूँ हीं हँस लिया करो, ख्वाबों के पंख उतार, हकीकत की जमीन पर चल लिया करो, माना पथरीली है जमीन, पर राहों की दु... »

Martyr’s Day Contest: Reply to Saavan team’s request

Dear All, This is in reply to Saavan team’s request to share the ways I used for promotions of my poem for Martyr’s Day Contest.  It was a joint effort of me, my daughter and my younger brother. I run a personal blog by the name – Jeevan Dhara, which has an active viewership of 5k people and also, I am an active contributor to various fb poetry pages. For the contest, I tried to ... »

वो माटी के लाल

वो माटी के लाल

वो माटी के लाल हमारे, जिनके फौलादी सीने थे, अडिग  इरादो ने जिनके, आजादी के सपने बूने थे, हाहाकार करती मानवता, जूल्मो-सितम से आतंकित थी जनता, भारत माता की परतंत्रता ने उनको झकझोरा था, हँसते-हँसते फाँसी के फँदे को उन्होंने चूमा था, वो माटी के लाल हमारे, राजगुरू, सुखदेव,भगतसिंह , जैसे वीर निराले थे , धधक रही थी उनके, रग-रग में स्वतंत्रता बन कर लहू, वो दीवाने थे, मतवाले थे, भारत माता के, आजादी के परवा... »

संसार के बाजार में दहेज

संसार के बाजार में दहेज

इस जहांँ के हाट में , हर  चीज की बोली लगती है, जीव, निर्जीव क्या काल्पनिक, चीजें भी बिकती हैं, जो मिल न सके वही , चीज लुभावनी लगती है, पहुँच से हो बाहर तो, चोर बाजारी चलती है, हो जिस्म का व्यापार या, दहेज लोभ में नारी पर अत्याचार, धन पाने की चाहे में, करता इन्सान संसार के बाजार में, सभी हदों को पार, दहेज प्रथा ने बनाया, नारी जहांँ में मोल-भाव की चीज, ढूँढ रही नारी सदियों से, अपनी अस्तित्व की थाह, ... »

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