Ritu Soni, Author at Saavan's Posts

ममता

एक युवती जब माँ बनती है, ममता के धागों से बच्चे का भविष्य बुनती है, ज़ज्बात रंग -बिरंगे उसके, बच्चे के रंग में ढलते हैं, दिल के तारों से हो झंकृत, लोरी की हीं गूंज निकलती, माँ अल्फाज़ में जैसे हो, दुनियां उसकी सिमटती चलती , फिर क्या, नयनों में झिलमील सपने, आँचल में अमृत ले चलती , पग -पग कांटे चुनती रहती, राहों की सारी बाधाएं, दुआओं से हरती चलती, हो ममता के वशीभूत बहुत, वो जननी बन जीवन जनती है, एक यु... »

भारत को स्वच्छ बनाना है

चलो उठो ये प्रण कर लें हम भारत को स्वच्छ बनाना है, धरती माँ के आँचल को हरियाले,फल-फूलों से सजाना है, प्रदूषण की जहरीली हवा से पर्यावरण को मुक्त बनाना है, तन स्वच्छ तो करते सब हैं मन को स्वच्छ बनाना है। चलो उठो ये प्रण कर लें हम भारत को स्वच्छ बनाना है, इस धरा के कण -कण में नव जीवन का संचार है, व्यर्थ नहीं कुछ इस जगत में, कचरे को भी नयी पहचान दें, पुनः नया कर उसके भी अस्तित्व को सम्मानदें। चलो उठो ... »

जीवन

सागर लहरें आग पानी जीवन की बस यही कहानी, ये जो है झीनी चादर जिंदगानी हमने- तुमने मिल बुनी है, रेशे-रेशे में घुली है तेरे-मेरे जज़्बातों की जवानी। सागर लहरें आग पानी जीवन की बस यही कहानी, चांदनी रातों के परों पर कितने अरमां की निशानी, ले उड़ी उन फलों की मीठी-मीठी सी कहानी। सागर लहरें आग पानी जीवन की बस यही कहानी, चादर के हम छोरों को पकड़े वक्त के मोड़ों में जकड़े, सिलवटों से कितने सपने ढों रहे हम अ... »

गणतंत्र दिवस

गणतंत्र दिवस की अरुणिम उषा में, राजपत की छवि निराली , हर रंगों की वेशभूषा में , भारत माता की छवि है प्यारी , उस पर तिरंगे का नील गगन में लहराना , जय हिन्द .जय भारती की, स्वरलहरी से गुंजित दिशाएं , हर जन के मन में, भारतवासी होने का अभिमान जगाए। भारत माँ के हर अंगों की, छटा बड़ी मनोहारी है, रंग – बिरंगे फूलों के अलंकार ने, अद्धभुत छटा बनाई है। भारत की सुंदरता गणतंत्र की , प्रजातंत्र में समायी ह... »

नव

नव

नभ के अरुण कपोलों पर, नव आशा की मुस्कान लिए, आती उषाकाल नव जीवन की प्यास लिए, दिनकर की अरुणिम किरणों का आलिंगन कर, पुष्प दल मदमस्त हुए,डोल रहे भौंरे अपनी मस्ती में, मकरन्द का आनंद लिए, नदियों के सूने अधरों पर ,चंचल किरणें भर रहीं , नव आकांक्षाओं का कोलाहल, जीव सहज हीं नित्य नवीन​ आशाओं के पंख लगाकर भरते उन्मुक्त गगन में स्वपनों की उड़ाने, नये-नये नजरिए से भरते जीवन में नव उन्माद सारे , चकित और कोर... »

नया साल

नया साल

पल महीने दिन यूँ गुजरे, कितने सुबह और साँझ के पहरे , कितनी रातें उन्नीदीं सी, चाँदनी रात की ध्वलित किरणें, कितने सपने बिखरे-बिखरे, सिमटी-सिमटी धुँधली यादें, कुछ कर जाती हैं आघाते , कभी सहला ,कर जातीं मीठी बातें, हौले-हौले साल यूँ गुजरा, जाते-जाते रूला गया, नये साल की नयी सुबह से, दामन अपना छुड़ा गया, कितने सपने दिखा गया । नये साल की नयी सुबह के , दहलीज पर आ गए हम, अनगिनत उम्मिदें बाँध खड़े हम, कित... »

स्पर्श

जीवन की पथरीली राहों पर, जब चलते-चलते थक जाऊँ, पग भटके और घबराऊँ मैं, तब करुणामयी माँ के आँचल सा स्पर्श देना, ऐ ईश मेरे । जब निराश हो, किसी मोड़ पर रूक जाऊँ, हताश हो, कुण्ठाओं के जाल से, न निकल पाऊँ मैं, तब सूर्य की सतरंगी किरणों सा, स्फूर्तिवान स्पर्श दे, श्री उमंग जगा देना, ऐ ईश मेरे। जब चंचल मन के अधीन हो, अनंत अभिलाषाओं के क्षितिज में, भ्रमण कर भरमाऊँ मैं, तब गुरु सम निश्छल ज्ञान का स्पर्श देन... »

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अब

अब ममता की छांँव और आत्मीयता को छोड़, व्यवसायिक मुकाम हासिल करने में जुटी जिंदगी । अब कुदरती हवा और चाँदनी रात के नज़ारों को भूल, वातानुकूलित कमरे और दूरभाष में जुटी जिंदगी । अब आधुनिकता की जद्दोजहद में खुशी-ग़म बाँटना भूल, अपने आप में सिमटती जिंदगी । अब भीतर से खोखली होती, दिखावटी मुखौटों से सुसज्जित होती जिंदगी। अब वात्सल्य, स्नेह, प्रेम बंधनों को तोड़, खुदगर्ज होती जिंदगी । अब मानसिक असंतुलन के... »

क्या-क्या छुपा रही थी

न जाने क्या-क्या छुपा रही थी, गर्मी की सुबह, वो शाल ओढ़े जा रही थी, धूल से पाँव सने थे,चंचल नयन बोझिल हुए थे, भूख से पेट धँसे थे,चकित हो मैं देख रही थी, मन ही मन ये पूछ रही थी, क्या यह ठंड से बचने की जुगत है या, तन ढकने को वो विवश है, कैसा अपना ये सभ्य समाज है, कोई नित्य नये परिधान बदलते, कुछ लोग वहीं टुकड़ो में ही पलते। न जाने क्या-क्या छुपा रही थी, तन पर कितने गर्द पड़े थे, उसको इसकी कहांँ फिकर ... »

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