राही अंजाना, Author at Saavan's Posts

ये ज़िन्दगी कैसी

परत दर परत यूँही खुलती सी नज़र आती है ज़िन्दगी, उधेड़ती तो किसी को सिलती नज़र आती है ज़िन्दगी, हालात बदलते ही नहीं ऐसा दौर भी आ जाता है कभी, के जिस्म को काट भूख मिटाती नज़र आती है ज़िन्दगी, दर्द जितना भी हो सहना खुद ही को तो पड़ता है जब, चन्द सिक्कों की ख़ातिर बिकती नज़र आती है ज़िन्दगी।। बदलती है करवटें दिन से लेकर रात के अँधेरे में इतनी, सच में कितने किरदार निभाती नज़र आती है ज़िन्दगी।। राही अंजाना »

मकर संक्रांति

मकर संक्रांति में जैसे ही ढल निकले, सूरज चाचू उत्तरायण में चल निकले, सोचा नहीं एक पल भी फिर देखो, टिकाई नज़र आसमाँ पर हम नकले, चढ़ा ली खुशबू रेवड़ी मूंगफली की ऐसे, के सुबह के भूले सारे मानो कल निकले, भर दिया जहन की ज़मी को ज़िद में अपनी, के ख्वाबों में टकराये जो हमसे वो जल निकले।। राही अंजाना »

रूह

छोड़ कर एक जिस्म को एक जिस्म में जाना होता है, बस यही एक इस रूह का हर एक बार बहाना होता है, रूकती नहीं बड़ी मशरूफ रहती है ज़िन्दगी सफ़र में, कहते हैं के इसका तो न कोई और ठौर ठिकाना होता है, बदलकर खुश रहती है ऐसे ही वो चेहरे ज़माने भर के, मगर सच ही तो है इसका न कोई एक घराना होता है, चार काँधों पर निकलती है फिर बदलती है रूप पुराना, इंसा को तो बस उसे दो चार ही कदम टहलाना होता है।। राही अंजाना »

उम्मीदों की गाड़ी

अपने काँधों पर अपनी ज़िन्दगी को उठाना पड़ा, वक्त के पहिये से कदमों को अपने मिलाना पड़ा, उलझने बहुत मिलीं दिल से दिमाग के रास्ते यूँ के, खुद से ही खुद ही को कई बार में सुलझाना पड़ा, सोंच का समन्दर कुछ गहरा इतना निकला राही, के उम्मीदों की गाड़ी को लहरों पर चलाना पड़ा।। राही अंजाना »

असमन्जस

असमंजस इसमें बिल्कुल नहीं के बच्चा हूँ मैं, बात ये है के ज़हन से अभी भी कच्चा हूँ मैं, आ जाऊँ बाहर या माँ की कोख में रह जाऊँ, सोच लूँ ज़रा एक बार के कितना सच्चा हूँ मैं, बड़ा मुश्किल है यहाँ पैर जमाना जानता हूँ मैं. मगर चाहता हूँ जान लूँ के कहाँ पर अच्छा हूँ मैं।। राही अंजाना »

आसमा

ज़मी पर जब भी गिरूँ आसमां से उठाने आता है, सोये हुए ख्वाबों को वो मेरे रोज़ जगाने आता है, दिखता किसी को नहीं ढूंढते सब हैं ठिकाने उसके, एक वो है जो राही को हर रस्ता दिखाने आता है, वहीं खड़ा हो जाता हूँ जहाँ से कुछ नज़र आता नहीं मुझे, हाथ उसका अँधेरे से मुझे रौशनी में दिखाने आता है।। राही अंजाना »

अंतर्मन

खामोश दिखने वाले अक्सर बहुत बोला करते हैं, अपने ही अंतर्मन को वो हर दम टटोला करते हैं, जिज्ञासा छिपती है पर चेहरे पर दिख जाती है, कभी कभी जब मुख से वो चुप्पी तोला करते हैं, सुनता नहीं कोई एक हद बांधी है सबने आगे, पर कहते हैं कुछ राही से बेहतर बोला करते हैं॥ राही अंजाना »

गरीबी

गरीबी की हर शय को मात देने को बैठा हूँ, मैं उम्र के इस पड़ाव को लात देने को बैठा हूँ, मजबूत हैं मेरे काँधे कुछ इस कदर मेरे दोस्तों, के मैं अपने सपनों को एक लम्बी रात देने को बैठा हूँ, वजन बेशक उठाया है सर पर अपनी मजबूरी का मैंने, मगर होंसले को अपनी सांसों की सौगात देने को बैठा हूँ।। राही अंजाना »

फुलवारी

रिश्तों की उधेड़ बुन में खुद को ही सिलना भूल गया, सबसे मिलने की चाहत में खुद से मिलना भूल गया, बचा नहीं कोई फूल खिले सब मेरी ही फुलवारी के, एक मैं जाने कैसे देखो खुद ही खिलना भूल गया।। राही अंजाना »

दिलों के तार

दिल जोड़ने वालों ने ही दिलों के तार काट दिए, खिलौनों से खेलने वाले बच्चों के यार काट दिए, ब मुश्किल ही बचे थे चन्द किस्से इस बचपन के, सुना है उसके भी किसीने पन्ने दो चार काट दिए।। राही अंजाना »

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