राही अंजाना, Author at Saavan's Posts

इज्जत

बहुत कुछ कहते कहते रुक जाया करते हैं, बात ये है के हम इज्जत कर जाया करते हैं, रखते हैं अल्फ़ाज़ों का समन्दर अंदर अपने, और ख़ामोशी से दिल में उतर जाया करते हैं, प्रश्न ये बिल्कुल नहीं के उत्तर मिलता नहीं हमें, जंग ये है के हम जवाबों में उलझ जाया करते हैं, हाथों की लकीरों पर “राही” हम चला नहीं करते, तो क्या हुआ मन्ज़िल के मुहाने पर तो जाया करते हैं।। राही (अंजाना) »

गुंजाईश

मेरी आँखों में ही खुद को निहारा करता है, हर रोज़ ही वो चेहरा अपना संवारा करता है, आईने के सही मायने उसे समझ ही नहीं आते, कहता कुछ नहीं बस ज़हन में उतारा करता है, गुंजाइय दूर तलक कहीं सच है नज़र नहीं आती, के वो किसी और के भी मुख को निखारा करता है।। राही (अंजाना) »

सर्दी नहीं जाने वाली

बन्द मुट्ठी में हैं मगर कैद में नहीं आने वाली, हाथों की लकीरों की नर्मी नहीं जाने वाली, आलम सर्द है मेरे ज़हन का इस कदर क्या कहूँ, के ये बुढ़ापे की गर्मी है यूँही नहीं जाने वाली, जमाकर बैठा हूँ आज मैं भी चौकड़ी यारों के साथ, अब अकेले रहने से तो ये सर्दी नहीं जाने वाली।। राही (अंजाना) »

सर्दी नहीं जाने वाली

बन्द मुट्ठी में हैं मगर कैद में नहीं आने वाली, हाथों की लकीरों की नर्मी नहीं जाने वाली, आलम सर्द है मेरे ज़हन का इस कदर क्या कहूँ, के ये बुढ़ापे की गर्मी है यूँही नहीं जाने वाली, जमाकर बैठा हूँ आज मैं भी चौकड़ी यारों के साथ, अब अकेले रहने से तो ये सर्दी नहीं जाने वाली।। राही (अंजाना) »

निगरानी

पत्थरों की नगरानी में शीशे के दिल रख दिए, इस नज़्म ऐ जवानी में ये किसने कदम रख दिए, मशहूर अँधेरे बाज़ार में जो मोल लग चुका था मेरा, इस ज़ख्म ऐ निशानी में ये किसने मरहम रख दिए, आहिस्ता-आहिस्ता किसी ख़्वाब की आगोश में जाने से पहले, इस जश्न ऐ कहानी में ये किसने भरम रख दिए, दवा और दुआ के दर छोड़ कर तेरी राह में “राही”, इस जिस्म ऐ रूहानी में ये फूल किसने नरम रख दिए॥ राही (अंजाना) राही (अंजाना) »

तरक़ीब

तरकीब कोई और ढूंढो ऐसे तो नज़र नहीं आने वाला, छुप कर बैठा है जो अंदर वो तो बाहर नहीं आने वाला, गहरा समन्दर है बहुत मन के भीतर हम सबके कोई, बिना डूबे तो देखो अब कोई तैर कर नहीं आने वाला, फांसला है मीलों का इस ज़मी से उस आसमाँ के जानिब, चलो अब तुम्हीं साथ मेरे बीच में कोई नहीं आने वाला, आँखों ही आँखों में हो जाने दो दिल की बातों को सारी, ज़ुबाँ पर अल्फ़ाज़ों का मन्ज़र अब कोई नहीं आने वाला।। राही (अंजाना) »

ताला

दिल के मेरे ताले की अजीज़ चाबी ले गया कोई, उम्र भर के लिए जैसे बेताबी दे गया कोई, शरारत कुछ ऐसी मुझसे छिप कर गया कोई, के अच्छे खासे दिल को खराबी दे गया कोई, महफूज़ रखे थे जो मन के दरवाजे के भीतर मैंने, उन एहसासों के दामन पर रंग गुलाबी दे गया कोई, उम्मीदों की खिड़कियों की गरारी घिसने से पहले ही, जबरन ही मेरी नज़रों को धार नवाबी दे गया कोई।। राही (अंजाना) »

कम देखा है

जितना भी देखा है मनो उतना ही कम देख है, मैंने इस दुनियाँ की आँखों में कितना कम देखा है, सड़कों पर पनपती इन बच्चों की कहानी से, किरदार जब भी देखा अपना मैंने विषम देखा है, बेबस रिहाई की उम्मीद में ज़िन्दगी को ढूंढते अक्सर, लोगों की आँखों को होते हुए मैंने नम देखा है।। राही (अंजाना) »

फुलझड़ियाँ

फुलझड़ियाँ

  आसमाँ छोड़ जब ज़मी पर उतरने लगती हैं फुलझड़ियाँ, हाथों में सबके सितारों सी चमकने लगती हैं फुलझड़ियाँ दामन अँधेरे का छोड़ कर एक दिन ऐसा भी आता है देखो, जब रौशनी में आकर खुद पर अकड़ने लगती हैं फुलझड़ियाँ, अमीरी गरीबी के इस भरम को मिटाने हर दीवाली पर, दुनियाँ के हर कोने में बिजली सी कड़कने लगती हैं फुलझड़ियाँ।। – राही (अंजाना) »

अंदाज़

हाथों की लकीरों की आवाज़ सुनानी होगी, अब दिल में छुपी जो हर बात बतानी होगी, खामोश रहने से कुछ मिलता नहीं सफ़र में, अब खुद से ही खुद को पुकार लगानी होगी, अंदाज़ यूँही तेरा समझ जाये वो महफ़िल ये नहीं, मानो “राही” यहाँ कोई तो और तरकीब लगानी होगी, बन्द मुट्ठी में तो नज़र किसी को आने नहीं वाली, तो खोल कर ही किस्मत सबको दिखानी होगी।। राही (अंजाना) »

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