राही अंजाना, Author at Saavan's Posts

बेख़ौफ़

चेहरे हर एक रोज बदलने का शौख रखते हैं, कुछ लोग अपने आप को बड़ा बेख़ौफ़ रखते हैं।। राही अंजाना »

खाल

छोटी सी उमर में बदल कर देखो चाल बैठ गया, पहनके इंसा ही जानवर की देखो खाल बैठ गया, बड़ी बहुत हो गई ख्वाइशों की बोतल उस दिन से, रिश्तों का कद भूल जब कोई देखो नाल बैठ गया, मनाया मगर माना नहीं रुठ कर जाने वाला हमसे, नमालूम बेवजह ही फुलाकर देखो गाल बैठ गया, उलझने सुलझाने को खुल के खड़े रहे हमतो आगे, बनाके परिस्थितियों का ही वो देखो जाल बैठ गया।। राही अंजाना »

तराज़ू

ज्ञान की पोथियाँ सारी चन्द पैसों में तोल लेता हूँ मैं, जो भी जब भी मुँह में आ जाये यूँही बोल देता हूँ मैं, समझ पाता नहीं हूँ किताबों में लिखे काले अक्षर मैं, सो तराज़ू के बाट बराबर ही सबका मोल लेता हूँ मैं, लोहा रद्दी प्लास्टिक को बेचने वाले क्या समझेंगे ये, के दो रोटी की ख़ातिर अपना ठेला खोल लेता हूँ मैं।। राही अंजाना »

तस्वीरें

मन की बातो को कलम के सहारे से इशारा देता हूँ मैं अंजाना होकर भी कुछ लहरों को किनारा देता हूँ, जब जुबां और दिल सब हार कर अकेले में बैठते हैं, तब मैं दर्द से भरी चुनिंदा तस्वीरों का सहारा लेता हूँ, डूबने के हजारों रास्ते समझदारी से सुझाते हैं लोग, मैं पागलपन में भी लोगों के हाथों में शिकारा देता हूँ।। राही अंजाना »

अक़्ल

कुछ बेदर्द इंसानों ने अपनी अक्ल उतार कर रख दी, मासूम ज़िन्दगी की आईने में शक्ल उतार कर रख दी, दिन में लगे जो गहरे घावों की वस्ल उतार कर रख दी, पुनर्जन्म के पन्नों की खुदरी नक़्ल उतार कर रख दी।। राही अंजाना वस्ल -मिलन( वस्ल की रात) »

पत्थर

तोड़ सके तो कोशिश कर ले एक और बार, अब कसम से दिल को पत्थर कर लिया मैंने।। राही अंजाना »

बिस्तर

अँधेरे की वाट लगाने को जुगनुओं को आना पड़ा, समन्दर में नहाने को खुद उतर चाँद को आना पड़ा, आवाज़ लगाई दिल ओ ज़ान से मगर सुनी नहीं गई, तो गमों के बिस्तरों को फिर आसुओं से भिगाना पड़ा।। राही अंजाना »

मरम्मत

मरम्मत उसूलों की करनी अभी बाकी रह गई, कहीं सच के मुँह पर लगी झूठी चाबी रही गई, बना तो लिए बर्तन सोने चाँदी के भी कारीगर ने, के अमीरी में गरीबी की थाली यूँही खाली रह गई, आईने में देखनी सूरत खुद ही की साकी रह गई, गुनाहों की मांगी थी शायद अधूरी माफ़ी रह गई।। राही अंजाना »

चाँद

छोड़ कर पीछे सबको आज चाँद को घुमाने निकला हूँ, सच कहता हूँ दोस्त मेरे आज खुद को गुमाने निकला हूँ, सोया था न जाने कब से समन्दर की बाँहों में यूँ अकेला, पिघले हुए एहसास को आज फिर जमाने को निकला हूँ, राही अंजाना »

बहोत ख़ूब

मैं बहोत खूब जानता हूँ उसे, खुद से जादा ही मानता हूँ उसे वो कहीं भी ढूढ़ता नहीं मुझको, मैं ख्वाबो में भी छानता हूँ उसे।। राही अंजाना »

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