शकुन सक्सेना, Author at Saavan's Posts

सबकी रातों में ख्वाबों की पहरेदारी रहती है

सबकी रातों में ख्वाबों की पहरेदारी रहती है, पर मेरी आँखों में खाली जिम्मेदारी रहती है, कहता हर शख्स है खुल कर दिल की अपने, पर मेरे चेहरे पे ठहरी सी दुनियाँदारी रहती है, सुना है यहाँ सबको- सबकी पूरी चाल मिलती है, पर खेल देखो हर बार एक मेरी ही बारी रहती है।। राही (अंजाना) »

डर के साये में

डर के साये में

डर के साये में खुद को दबाये बेटियाँ रहती हैं, बहुत कुछ है जो खुद ही छुपाये बेटियाँ रहती हैं, अपने को अपनों से पल-पल बचाये बेटियाँ रहती हैं, होठों को भला किस कदर सिलाए बेटियाँ रहती हैं, कहीं कन्धे से कन्धा खुल के सटाये बेटियाँ रहती हैं, कहीँ नज़रों को सहसा क्यों झुकाये बेटियाँ रहती हैं॥ – राही (अंजाना) »

संस्कारों के बीज

संस्कारों के बीज

संस्कारों के बीज यहाँ पर अक्सर बोये जाते हैं, सम्बंधों के वृक्षों पर नये पुष्प संजोये जाते हैं, मात-पिता, दादा-दादी और भाई बहन के नातों से, हर एक क्षण में खुशियों के कई रंग पिरोये जाते हैं, आन पड़े जब मुश्किल सिर तब रश्ते परखे जाते हैं, लोग रहें मिल-जुल कर जिस घर परिवार बताये जाते हैं।। – राही (अंजाना) »

मिलने से पहले

मिलने से पहले इतना मत घबराया करो, हर बात को यूँ मुझसे न बताया करो, देखना है गर उस खुदा की रहमत तो, सर ही नहीं दिल को भी तो झुकाया करो, चुप रहकर ही चेहरे पर सब न दिखाया करो, कुछ तो हवाओं के साथ उड़ाया करो, अब इतना भी न हमको सताया करो, सपनों में सही पर गले से तो लगाया करो।। – राही (अंजाना) »

छू कर नहीं देखोगे तो सपना ही लगेगा

छू कर नहीं देखोगे तो सपना ही लगेगा, इस मिट्टी सा तुमको कोई अपना नहीं लगेगा।। – राही (अंजाना) »

अर्जियां लाया हूँ

अर्जियां लाया हूँ लिखकर चेहरे पर अपने, कलम को अपनी ज़रा विश्राम दिया है, झुकाया नहीं है आँखों को तेरे दर पर आज, पलकों को अपनी ज़रा आराम दिया है, छोड़ कर बैठा हूँ आज मन्ज़िल अपनी, कदमों को अपने ज़रा ठहराव दिया है, थक चुका हूँ बोलते बोलते कुछ इस तरह कि, होंटो को खामोशी का अब, ज़रा हथियार दिया है॥ – राही »

डिजिटली कैद जिंदगी

मोबाइल की उपस्थिति में किताबों की अनुपस्थिति लग रही है, जिंदगी छोटे से गैजेट्स में डिजिटली कैद लग रही है।।  – राही (अंजाना) »

ख़्वाबों से बाहर निकल के देखते हैं

ख़्वाबों से बाहर निकल के देखते हैं

ख़्वाबों से बाहर निकल के देखते हैं, चलो आज हकीकत से मिल के देखते हैं, बहुत दिन हुए अब छुपाये खुद को, चलो आज सबको रूबरू देखते हैं, बड़ी भीड़ है जहाँ तलक नज़र जाती है, चलो दूर कोई खाली शहर देखते हैं।। – राही (अंजाना) »

कुछ भी नहीं छुपाता हूँ मैं माँ को सब कुछ बताता हूँ

कुछ भी नहीं छुपाता हूँ मैं माँ को सब कुछ बताता हूँ, माँ मुझ पर प्यार लुटाती है मैं सब कुछ भूल जाता हूँ, मैं भूखा जब हो जाता हूँ माँ मुझको खूब खिलाती है, पर कभी कभी माँ मेरी चुप के भूखी भी सो जाती है, मैं दूर कहीँ भी जाता हूँ माँ मुझको पास बुलाती है, मैं माँ को भूल न पाता हूँ माँ मुझको भूल न पाती है।। – राही (अंजाना) »

जिंदगी तो हर पल जंग सी लगती है

सवाल जीत का है या हार का न मालूम राही, मगर जिंदगी तो हर पल जंग सी लगती है।। – राही (अंजाना) »

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