राही अंजाना, Author at Saavan's Posts

अभिमान

जो छूले मन कोई मेरा मुझे अभिमान हो जाये, क्या होती है हृदय धड़कन मुझे भी ज्ञान हो जाये, किसीकी बात सुनकर मैं भटक जाऊँ नमुमकिन है, वो दे आवाज़ तो मैं ज़िंदा हूँ मुझे भी भान हो जाये, आसमां से गिरा धरती पे जो वो टूटा एक सितारा हूँ, वो देखे एक नज़र मुझको मुझे मेरी पहचान हो जाये।। राही अंजाना »

कारीगर

दिलों को सिलने वाला कारीगर ढूंढ निकाला, हार कर जितने वाला बाज़ीगर ढूंढ निकाला, »

मदहोश

होश में रहने वाले ही अक्सर बेहोश निकले, बिना पिए ही पीने वालों से मदहोश निकले, बोलने वालों की भीड़ का जायज़ा किया हमने, न बोलने से बोलने वाले ज्यादा ख़मोश निकले, जो बहाने बनाते रहे साथ हैं हम तुम्हारे कहके, बगल में रहने वालों से ज़्यादा सरगोश निकले।। राही अंजाना »

पता

एक मासूम सी ज़िन्दगी को यूँ दगा दे गई, उड़ाकर खुशियाँ सारी गमों को सजा दे गई, कहते हैं जो मरहम लगाने आई थी वो यारों, बेवजह वही ज़ख्मो को खुल के हवा दे गई, चाँद तारों भरी कायनात ने बताया मुझको, एक जुगनू भरी रात थी तुम्हारा पता दे गई, बनाके खड़ी की मोहब्बत में इमारतें जिसने, उसी के घर को राही ये दुनियां क्या दे गई।। राही अंजाना »

माईने

सच और झूठ के माईने बदल गए, ऐसा हुआ क्या के आईने बदल गए, साध के बनाई जब हाथों की लकीरें, तो राहों में लोग क्यों लाईने बदल गए, राही अंजाना »

दिल दिमाग

अपने दिल को दिमाग से हर रोज लड़ाता है, इंसान इंसानों के बीच रहके भी फड़फड़ाता है।। राही अंजाना »

ताजमहल

कौन कहता है के हम सब कुछ पल दो पल में कर लेंगे, हम तो मेहमाँ ही दो पल के पल दो पल में क्या कर लेंगे, रहने दो ज्यादा से ज्यादा थोड़ा तो उथल पुथल कर लेंगे, डूब समन्दर में जायेंगे और हम गंगा जल में घर कर लेंगे, दिल का हाल बेहाल सुना है कहते हैं प्रेम सरल कर लेंगे, अनपढ़ होकर लिखने वाले हम पूरी हर गज़ल कर लेंगे, जिस दिन रेत पर चलने वाले रातों को मखमल कर लेंगे, उसी समय से राही हम अपने सपने ताजमहल कर लेंगे... »

चोरी

दिल अपना है मगर धकड़न पराई है, इस बात की खबर मैंने ही फैलाई है, नज़र वालों ने ही यहाँ नज़र चुराई है, इस बात में ढूँढो तो कितनी सच्चाई है, किसीने न सुनी मैंने सबसे जो छिपाई है, इस बात को दीवार के कान में सुनाई है, राही अंजाना »

तराजू

तराजू के दोनों पलड़ों पर रखकर आंकते देखा, वजन प्यार का फिर भी मेरे कम भाँपते देखा, बन न पाया था किसी साँचे से जब आकार मेरा, के लेकर हाथों में फिर मिट्टी को नरम नापते देखा, ढूंढते थक हार कर बैठ गए जब मिलने वाले सारे, नज़रों से गढ़ाये नज़रों को ही फिर यूँ काँपते देखा॥ राही अंजाना »

ज़ाहिर

साथ निभाने के लोगों के तरीके अजीब हैं, अपनों से भी ज्यादा लोग गैरों के करीब हैं, मर चुके हैं एहसास यूँ दिल की हिफाज़त में, के धड़कन में नज़रबंद वो कितने अदीब हैं, गुमराह हैं नासमझ इशारे खुदा के ठुकराते हैं, क्या करें राही सबके अपने अपने नसीब हैं।।। राही अंजाना अदीब – विद्वान »

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