Shakun, Author at Saavan's Posts

इलज़ाम

उसने बेबुनियाद इल्जामों की मुझपर फहरिस्त लगा दी, जीवन कटघरे को मानों जैसे हथकड़ी लगा दी, छटपटाते रहे मेरे जवाब किसी मछली से तड़पकर, और सवालों की उसने मानों कीलें सी चुभा दी, बेगुनाह था मगर फिर भी खामोशी साधे रहा, मग़र उसने तो सारे लहजों की धज्जियाँ उड़ा दी॥ राही (अंजाना) »

सरेआम रक्खे हैं।

बड़े इत्मिनान से मेरे जहन में कुछ सवाल रक्खे थे, हो जाने को ज़माने से रूबरू मेरे खयाल रक्खे थे, बड़ी बेचैनी से एक नज़र जब पड़ी उनकी हम पर, खुद को यूँ लुटा बैठे जैसे के बिकने को हम खुलेआम रक्खे थे, दर्द बहुत थे छिपे मेरी पलकों के पीछे पर नज़र में किसी के नहीं थे, एक ज़रा सी आहट क्या हुई यारों निकल आये सारेआम आँसू जो तमाम रक्खे थे॥ राही (अंजाना) »

बैठी है

बैठी है

देखकर जिसको जुड़ जाते हैं हाँथ अक्सर, आज वही फैला कर दोनों हाँथ बैठी है, झुकाकर निकलते हैं हम जिसके आगे सर अपना, आज वही सरेबाजार सर झुकाकर बैठी है, टूटने नहीं देती है जो कभी नींद हमारी, आज भूल कर सभी ख्वाब वो नींद उड़ा कर बैठी है, बचाकर हर नज़र से जो हमे छिपाती रही उम्र भर, आज सफ़र ऐ सहर से वही नज़र मिलाकर बैठी है॥ राही (अंजाना) »

जवाब माँगता है

जो करता रहा इंतज़ार पल पल, आज हर पल का वो हिसाब माँगता है, दिल के रिश्तों की कीमत और प्यार का खिताब माँगता हैं, कितना बदल गया है वो, हर बात पर अब ईनाम माँगता है, तरसता था मिलने को हर दिन कभी, आज वही हर दिन वो इतवार माँगता है, बिन कुछ कहे चलता रहा साथ जो, वो आज दो कदम पर विश्राम माँगता है, पूछा ना सवाल कोई जिसने एक क्षण भी कभी, वो आज छोटी छोटी बात पर जवाब माँगता है॥ #राही# »

मेरी आँखों में

जाने कब से हैं मेरी आँखों में, ये ख्वाब किसके हैं मेरी आँखों में। मैं तो सूखा हुआ सा दरिया था, ये मौज किसकी है मेरी बाहों में।। मैं तो सोया था तन्हा रातों में, ये पाँव किसके हैं मेरे हाथों में। यूँ तो रहता था सूने आँगन में, ये बोल किसके हैं मेरे आँगन में।। सूखा बादल था मैं तो राहों का, ये बून्द किसकी है मेरी राहों में, चुप ही रहते थे शब्द नज़्मों में, ये होंठ किसके हैं मेरी ग़ज़लों में॥ राही (अंजाना) »

बखूबी

बहुत ही बखूबी से तुमने मुझे नज़रन्दाज़ किया, जानते हुए भी मुझको क्यूँ अनजान किया, जब खामोश मोहब्बत ही हमारी जुबान थी, तो क्यों रिश्तों को अपने यूँ अज़ान किया॥ To be cont.. राही (अंजाना) »

माँ

ममता के आइने मे प्यारी सी सूरत है माँ, सूरज की धूप मे छाया का आँचल है माँ, दुखों के समन्दर में सुख का किनारा है माँ, दुनियॉ की भीड़ में सकून का ठिकना है माँ, अँधेरी कोठरी में रौशनी का उजाला है माँ, प्रेम और स्नेह में प्रकर्ति की गोद है माँ। बेमोल अलंकारों में अनमोल नगीना है माँ, निराकार भगवान की साकार प्रतिमा है माँ॥ राही# »

छुपा लूँ क्या

तेरी आँखों के बिस्तर पर अपने प्यार की चादर बिछा दूँ क्या? तेरे ख़्वाबों के तकिये के सिरहाने मैं सर टिका लूँ क्या? कर दूँ मैं मेरे दिल के जज़्बात तेरे नाम सारे, दे इजाज़त के तेरी आँखों से मेरी आँखें मिला लूँ क्या? अच्छा लगता है मुझे तेरी पलकों का आँचल, तू कहे तो खुद को इस आँचल में छुपा लूँ क्या? राही (अंजाना) »

कुछ कह नहीं सकता

मिल जायेगी ताबीर मेरे ख्वाबों की एक दिन, या ख्वाब बिखर जायें कुछ कह नहीं सकता। बह जाउं समंदर में तिनके की तरहं या फ़िर, मिल जाये मुझे साहिल कुछ कह नहीं सकता। इस पार तो रौशन है ये मेरी राह कहकशा सी, मेरे उस पार अंधेरा हो कुछ कह नहीं सकता। गुमनाम है ठिकाना और गुमनाम मेरी मंजिल, किस दर पे ठहर जाउं, कुछ कह नहीं सकता। एक बेनाम मुसाफिर हूँ और बेनाम सफर मेरा, किस राह निकल जाउं, कुछ कह नहीं सकता। कर दी है ... »

राही बेनाम

न ये ज़ुबाँ किसी की गुलाम है न मेरी कलम को कोई गुमान है, छुपी रही बहुत अरसे तक पहचान मेरी, आज हवाओं पर नज़र आते मेरे निशान है, जहाँ खो गईं हैं मेरे ख़्वाबों की कश्तियाँ सारी, वहीं अंधेरों में जगमगाता आज भी एक जुगनू इमाम है, कुछ न करके भी जहाँ लोगों के नाम हैं इसी ज़माने में, वहीं बनाकर भी राह कई ये राही बेनाम है॥ राही (अंजाना) »

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