Salil Saroj, Author at Saavan's Posts

गफलत

जो भी जी में आए फेकिए जनाब तवा पे अपनी रोटी सेकिए जनाब गाय के नाम पे इंसानों को बाँटिए फिर तमाशा गौर से देखिए जनाब बाकी सब को भुला दीजिए आप बस खुद का नाम लिखिए जनाब गधों की रेस है हर पाँचवे साल आप सबसे तेज़ रेंकिए जनाब बड़ा मुश्किल है बिना इसके जीना कब्र पे भी एक कुर्सी टेकिए जनाब सलिल सरोज »

इस कागज़ी बदन को यकीन है बहुत

इस कागज़ी बदन को यकीन है बहुत दफ्न होने को दो ग़ज़ ज़मीन है बहुत तुम इंसान हो,तुम चल दोगे यहाँ से पर लाशों पर रहने वाले मकीं* हैं बहुत भरोसा तोड़ना कोई कानूनन जुर्म नहीं इंसानियत कहती है ये संगीन है बहुत झुग्गी-झोपड़ियों के पैबन्द हैं बहुत लेकिन रईसों की दिल्ली अब भी रंगीन है बहुत वो बरगद बूढ़ा था,किसी के काम का नहीं पर उसके गिरने से गाँव ग़मगीन है बहुत बस एक हमें ही खबर नहीं होती है वरना ये देश विकास में... »

खून का रंग

खून का रंग

खून का रंग- कैसे तय होता है? विज्ञान की मानें तो आर बी सी से परिवार की माने तो माँ-बाप से समाज की माने तो जाति, धर्म,वर्ण से राजनीति की माने तो वोट और नोट से। इतने मानक है फिर भी लहू लाल ही है फिर इतने मानक क्यों है और सब भ्रामक क्यों हैं। क्या इतना मानना काफी नहीं खून किसी भी मानक का हो धमनियों में जब तक दौड़ता है ज़िंदा रहता है और जब सड़क के बीच आता है तो मर जाता है। क्या हमें अब मानक बदलने नहीं चा... »