Pradumn Chourey, Author at Saavan's Posts

क्रांतियुवा

खल्क ये खुदगर्ज़ होती। आरही नज़र मुझे।। इंकलाब आयेगा ना अब। ये डर सताता अक्सर मुझे।। अशफ़ाक़ की,बिस्मिल की बातें। याद कब तक आएँगी।। शायद जब चेहरे पे तेरे। झुर्रियां पड़ जाएँगी।। क्या भूल गए हो उस भगत को। जान जिसने लुटाई थी।। तेईस में कर तन निछावर। दीवानगी दिखाई थी।। वीरता के रास्तों से आज़ादी घर पर आई थी। बेड़ियों के निशां थे सर पर और खून में नहाईं थी।। आज सूरज वीरता का। बादलों में गुम है।। आधुनिक समय का... »

एक संवाद तिरंगे के साथ।

जब घर का परायों का संगी हुआ। क्रोधित तेरा शीश नारंगी हुआ। ये नारंगी नासमझी करवा न दे। गद्दारों की गर्दने कटवा न दे।। साँझ को अम्बर जब श्वेत हुआ। देख लेहराते लंगड़ा उत्साहित हुआ।। श्वेताम्बर गुस्ताखी करवा न दे। मेरे हाथों ये तलवारें चलवा न दे।। तल पे हरियाली यूँ बिखरी पड़ी। खस्ता खंडहरों में इमारत गड़ी।। ये हरियाली मनमानी करवा न दे। गुलमटों को अपने में गड़वा न दे।। तेरा लहराना मुसलसल कमाल ही है। तेरी भ... »

वन डे मातरम

स्वतंत्र हैं हम देश सबका। आते इसमें हम सारे हर जाती हर तबका।।   सोई हुई ये देशभक्ति सिर्फ दो ही दिन क्यूँ होती खड़ी। एक है पंद्रह अगस्त और दूसरा छब्बीस जनवरी।।   देश रो रहा रोज़ रोज़ फिर एक ही दिन क्यों आँखे नम अब बंद करदो बंद करदो ये वन डे वन डे मातरम्   देखो कितना गहरा सबपर दिखावे का ये रंग चढ़ा। एक दिन तिरंगा दिल में अगले ही दिन ज़मीन पे पड़ा।।   उठते तो हो हर सुबह चलो उठ भी जाओ अ... »

कविनिकेतन

यह कविता एक ऐसे आवास के विषय में है जो सिर्फ कवि या लेखकों के मन में निर्मित है। कवियों के उस आवास को मैंने कविनिकेतन नाम दिया है। इस कविता में उसी आवास का वर्णन है। कविता की लय बरकरार रखने के लिए सभी महान कवियों के नाम सीधे सीधे इस्तेमाल किये गए हैं। मेरा उद्देश्य उनका अपमान करना नहीं है। मैं उन सभी कवियों का सम्मान करता हूँ व उनकी रचनाओं के लिए उन्हें नमन करता हूँ। तो पेश है – “कविनि... »

अमरकंठ से निकली रेवा

अमरकंठ से निकली रेवा अमृत्व का वरदान लीए। वादियां सब गूँज उठी और वृक्ष खड़े प्रणाम कीए। तवा,गंजाल,कुण्डी,चोरल और मान,हटनी को साथ लीए। अमरकंठ से निकली रेवा अमृत्व का वरदान लीए। कपिलधार से गिरकर आई जीवों को जीवन दान दिए। विंध्या की सूखी घाटी में वन-उपवन सब तान दिए। पक्षियों की ची ची चूं चूं शेरों की दहाड़ लिए। अमरकंठ से निकली रेवा अमृत्व का वरदान लीए। सात पहाड़ों से ग़ुज़रे ये सतपुड़ा की शान है। प्राकृतिक... »

ये बूढ़ी आँखें

ये बूढ़ी आँखें। ये सब कुछ तांके।। ये सल भरे पन्ने। पुरानी किताबें।।   विशाल से वृक्ष थे। जो अब झुक गय हैं।। दौड़ते धावक थे। जो अब रुक गय हैं।।   कुछ गांठों को। ये सुलझा गये हैं।। ये सुगंधित पुष्प थे। जो मुरझा गये हैं।।   इस समंदर की। ये अनुभवी लहर हैं।। इनके विचारों। से ही सहर है।।   इन की थपकी से। निंदिया आती।। कहानी,किस्सों से। साँझ ढल जाती।।   ये कल की सोचें। ये कल में झा... »

छोटू

छोटू

दुबले-पतले,गोरे-काले। तन पर कपड़े जैसे जाले।। दिख जाते हैं। नुक्कड़ पर,दुकानों पर। ढाबों पर,निर्माणधीर मकानों पर।। देश में इन की पूरी फौज। बिना लक्ष्य ये फिरते हैं यहां वहां हर रोज़।। ज़िन्दगी के पाठ ये बचपन में सीख लेते हैं। कल की इन्हें फिकर नहीं ये आज में जीते हैं।। कुछ अनाथ हैं। कुछ के पास परिवार का साथ है।। नन्ही सी उम्र में ये परेशान,मजबूर हैं। देश डिजिटल हो रहा है,ये एनालॉग से भी दूर हैं।। इनके... »

कागज़ और कलम

जब आसपास की खट पट खामोशी में बदलती है। जब तेज़ भागती घडी की सुइंया धीरे धीरे चलती है।।   दिनभर दिमाग के रास्तों पर विचारों का जाम होता है। मन रूपी मेरी तकती पर नजाने किस किस का नाम होता है।।   जब विचारों का ये जाम हौले हौले  खुल जाता है। और सर सर करते पंखे का शोर भी कानो में घुलता जाता है। तब अचानक कल्पनाओं का इंद्रधनुष खिल जाता है।।   कागज़ और कलम की बातें तब सुनने में आती हैं। कागज़ ... »

मस्ती में कूदा मैं मस्ती में झूमा।।

 प्रद्युम्न चौरे »

मेरे पिता मेरी अभिव्यक्ति।।

इस बार बादलो को खोजा हैं  पहले खुद छा जाते थे  इस बार  शब्दों को ढूंढा है  पहले खुद आ जाते थे  बेतुके से लगने लगे  अपने ही शब्द  ये देख कर में रह  गया अचंभित,स्तब्ध  इस बार लहरों  को  नहीं  समंदर को चुना था इन्होने ही मेरा  पूरा  राह उनकी काटों से  भरी रही  मगर मन  रूपी घांस  हमेशा हरी रही  जीवन में कठिनाइयाँ  आई  मगर कभी  भी  गलत राह  नहीं अपनाई  जब विशाल पेड़  थे  तो सबने ली छाया  कुछ टहनियां क्य... »

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