Panna, Author at Saavan's Posts

दिन, महीने और साल

दिन, महीने और साल गुजरते जाते हैं और इक दिन आदमी भी इनमें गुजर जाता है| »

बात से बात चले

गुफ़्तगु बंद न हो, बात से बात चले मैं तेरे साथ चलूं, तू मेरे साथ चले| »

आज कुछ लिखने को जी करता है

आज कुछ लिखने को जी करता है आज फिर से जीने को जी करता है दबे है जो अहसास ज़हन में जमाने से उनसे कुछ अल्फ़ाज उखेरने को जी करता है »

दास्ता ए जिंदगी

चंद पन्नों में सिमट गयी दास्ता ए जिंदगी अब लिखने को बस लहू है, और कुछ नहीं| »

इक रब्त

इक रब्त था जो कभी रहता था दरम्या हमारे किस वक्त रूखसत हुआ, खबर नहीं| »

कफ़स

कफ़स

इन परों में वो आसमान, मैं कहॉ से लाऊं इस कफ़स में वो उडान, मैं कहॉ से लाऊं   (कफ़स  = cage) हो गये पेड सूने इस पतझड के शागिर्द में अब इन पर नये पत्ते, मैं कहॉ से लाऊं जले हुए गांव में अब बन गये है नये घर अब इन घरों में रखने को नये लोग, मैं कहॉ से लाऊं बुझी-बुझी है जिंदगी, बुझे-बुझे से है जज्बात यहॉ इस बुझी हुई राख में चिन्गारियॉ, मैं कहॉ से लाऊं पथरा गयी है मेरे ख्यालों की दुनिया अब इस दुनिया में ... »

चमकता जिस्म, घनी जुल्फ़े

चमकता जिस्म, घनी जुल्फ़े

चमकता जिस्म, घनी जुल्फ़े, भूरी भूरी सी आंखे यही है वो मुज़रिम जिसने कत्ल ए दिल किया है – Panna »

लिखते लिखते आज

लिखते लिखते आज कलम रूक गयी इक ख्याल अटक सा गया था दिल की दरारों में कहीं| »

खेल

खेल

जिंदगी खेलती है खेल हर लम्हा मेरे साथ नहीं जानती गुजर गया बचपन इक अरसा पहले खेल के शोकीन इस दिल को घेर रखा है अब उधेड़ बुनों ने कसकर अब इनसे निकलूं तो खेलूं कोई नया खेल जिंदगी के साथ| »

अगर तुम न मिलते

जिंदगी का कारवां यूं ही गुजर जाता अगर तुम न मिलते हमारे लफ़्जों में कहां कविता उतरती अगर तुम न मिलते »

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