Panna, Author at Saavan's Posts

मुखौटा

इक मुखौटा है जिसे लगा कर रखता हूं जमाने से खुद को छुपा कर रखता हूं दुनिया को सच सुनने की आदत नहीं सच्चाई को दिल में दबा कर रखता हूै बस रोना आता है जमाने की सूरत देखकर मगर झूठी हंसी चेहरे से सटा कर रखता हूं आयेगी कभी तो जिंदगी लौट के मेरे पास इंतजार में पलके बिछा कर रखता हूं आज इक नया मुखौटा लगा कर आया हूं मैं कई सारे मुखौटा बना कर रखता हूं »

नजरे

इक अरसे बाद नजरे मिली उनसे हमारी नजरों ने पहचाना और अन्जान कर दिया »

दिन, महीने और साल

दिन, महीने और साल गुजरते जाते हैं और इक दिन आदमी भी इनमें गुजर जाता है| »

मिलना न हुआ

कितनी मिन्नतों के बाद में मिला तुझसे मगर मिलकर भी मेरा मिलना न हुआ क़ी कई बातें, कई मर्तबा हमने मगर इक बात पे कभी फैसला ना हुआ »

अब नहीं होगा जिक्र

अब नहीं होगा जिक्र आपका हमारे आशियाने में न होगी नज्म कोई आपके नाम से »

दिन, महीने और साल

दिन, महीने और साल गुजरते जाते हैं और इक दिन आदमी भी इनमें गुजर जाता है| »

बात से बात चले

गुफ़्तगु बंद न हो, बात से बात चले मैं तेरे साथ चलूं, तू मेरे साथ चले| »

आज कुछ लिखने को जी करता है

आज कुछ लिखने को जी करता है आज फिर से जीने को जी करता है दबे है जो अहसास ज़हन में जमाने से उनसे कुछ अल्फ़ाज उखेरने को जी करता है »

दास्ता ए जिंदगी

चंद पन्नों में सिमट गयी दास्ता ए जिंदगी अब लिखने को बस लहू है, और कुछ नहीं| »

इक रब्त

इक रब्त था जो कभी रहता था दरम्या हमारे किस वक्त रूखसत हुआ, खबर नहीं| »

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