Neha, Author at Saavan's Posts

अजन्मी बेटी की पुकार

माँ मुझे भी इस दुनिया में ले आओ न इस जग की लीला मुझे भी दिखलाओ न खुले आसमान के नीचे मुझको घुमाओ न अपनी ममतामई गोद में खिलाओ न पढ़ा लिखा कर मुझे भी अफसर बनाओ न गर्व से करूंगी नाम रोशन आप सबका माँ मान और सम्मान सब दिलवाऊँगी माँ पापा का भी हाथ मैं बटाऊँगी माँ न मारो मुझको यूं तोड़ कर माँ मौका तो दो कुछ कर गुजरने का माँ।। »

मिट्टी के ढेर

मिट्टी के ढेर हैं हम सब यहाँ वक़्त का खेल है न जाने कब बिखर जाये।। »

मिट्टी के ढेर

मिट्टी के ढेर हैं हम सब यहाँ वक़्त का खेल है न जाने कब बिखर जाये।। »

कुछ बनना है तो

कुछ बनना है तो फूलों की तरह बनों अपनी महक से दुनिया महका दो कुछ बनना है तो तितली की तरह बनों अपने रंग दूसरों में बिखरा दो कुछ बनना है तो जुगनू की तरह बनों अपनी रोशनी से दुनिया जगमगा दो कुछ बनना है तो दुग्ध की तरह बनो अपने अंदर दुनिया समां लो।। »

पापा

गर देती है जन्म माँ तो जिंदगी संवारते हैं पापा जितना भी हो सकता है सब कुछ कर गुजरते हैं पापा जेब गर खाली भी हो तो कर्ज ले आते हैं पापा अपने बच्चों के सपने को हकीकत में बदल देते हैं पापा जिस भी चीज़ को मांगो तुरंत दिला देते है पापा अपने बच्चों के लिए कुछ भी कर गुजरते हैं पापा उँगली पकड़ के चलना सिखाकर खुद के पैरों पर खड़ा करते हैं पापा जिंदगी की हर जमा पूँजी को बच्चों पर न्योछावर करते हैं पापा।। »

बहुत से ख़्वाब

बहुत से ख़्वाब है आँखों में मेरे सारे नहीं तो कुछ तो हकीक़त में आएँ माना के करनी है बहुत मेहनत हमको भी ज़रा आप भी तो उसमे अपना हाथ मेरे सर पर लाएँ।। »

कामना

हमारे दिल की धड़कन है तू हमारे जिगर का टुकड़ा है तू छुए तू इतनी ऊंचाइयों के कि दुनियां जहाँ में मशहूर हो तू।। »

माँ

दुनिया की भीड़ में जब कभी अकेली होती हूँ तो बहुत याद आती है मुझे मेरी माँ खुशियाँ हो या गम हो हर सुख दुःख में बहुत याद आती है मुझे मेरी माँ जब भी किसी तकलीफ़ में होती हूँ तो बहुत याद आती है मुझे मेरी माँ जब कभी नींद न आती है मुझे तो बहुत याद आती है मुझे मेरी माँ जब होती हूँ बेचैन तो बस तेरी सुकून की गोद याद आती है मुझे मेरी माँ जब दिल याद में तेरी भीगा होता है तो सिर्फ तेरा ही आँचल याद आता है मुझे म... »

बदलती जिंदगी

कल तक जिस आँगन में पली और बड़ी हुई आज उसी के लिए पराया हो गया है कल तक जिस चीज़ को मन करता उठाया आज अपने वो हाथों को बाँधे बैठी है कल तक जो करती थी अतिथि सत्कार वो अब खुद उसी जगह पर आ बैठी है कल तक जो सारी बातें साझा करती थी आज वो कई बातों को छिपाये बैठी है कल तक तो थी हर जिम्मेदारी से दूर आज वही जिम्मेदारियों को संभाले खड़ी है कभी रहती न थी चुपचाप और गुमसुम आज वही एकांत किसी कोने में खड़ी है कल तक तो... »

बेटी

आँखों ही आँखों में जाने कब बड़ी हो जाती है बिन कुछ कहे सब कुछ समझ जाती है जो करती थी कल तक चीज़ों के लिए ज़िद आज वो अपनी इच्छाओं को दबा जाती है अब कुछ भी न कहना पड़ता है उससे सब कुछ वो झट से कर जाती है एक गिलास पानी का भी न उठाने वाली आज पूरे घर को भोजन पकाती है कभी भी कहीं भी बैग उठा कर चल देने वाली आज वो अपना हर कदम सोंच समझ कर बाहर निकालती है।। »

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