Moti lal gupta, Author at Saavan's Posts

कृष्ण जन्माष्टमी की शुभकामना

तन को दीप बनाय के, मन में ज्योति जलाय मोती हरि आरत करें, जीवन भोग लगाय मोहक मन भावन छवि, मेघ वर्ण अति रूप मृगी नयन कोमल बदन, लज्जित मदन अनूप रूप राशि मुख चन्द्र सों, चकाचौंध चहुँ लोक चकित होय चित्रवत खड़े, मोती मुदित बिलोक किलकारी कान्हा सरस, सुन सुर मुदित अघाय खिला बसंत ब्रज भूमि वन, जलद सरस चहुँ छाय »

जय जननी

जय हे भारत स्वर्ण भूमि जय जय जननी, जय कर्म भूमि हे गंगा यमुना ब्रह्म सरस्वती पावन सतलज सिन्ध बहे विन्ध्य हिमालय गिरी अरावली मणि माणिक नवरत्न भरे जलधि हिन्द बंगाल अरब जल स्वर्ण भूमि नित अंक भरे आर्य द्रविड़ मंगोल भूमि हे हिन्दू इसाई यवन मातृ जय जय हे भारत स्वर्ण भूमि जय जय जननी, जय कर्म भूमि हे वाल्मिक मुनि व्यास कालि कवि तुलसी सूर कबीर संत स्वर गूँजे धनुष टंकार राम की गीता का उपदेश गूँजे जय राणा जय... »

जंगे आज़ादी (आजादी की ७०वी वर्षगाँठ के शुभ अवसर पर राष्ट्र को समर्पित)

वर्ष सैकड़ों बीत गये, आज़ादी हमको मिली नहीं लाखों शहीद कुर्बान हुए, आज़ादी हमको मिली नहीं भारत जननी स्वर्ण भूमि पर, बर्बर अत्याचार हुये माता बहन बेटियों के, इज्ज़त धन सम्मान लुटे बिक गये धरम लुट गये करम, सब ओर गुलामी बू छायी प्राचीन सभ्यता संस्कृति गौरव, भूल गये हम सच्चाई ब्राह्मण कहता हम सर्वशेष्ट, छत्रिय कहता हम शासक है बनिया कहता हम धन कुबेर, हरिजन अछूत बस सेवक है मंदिर मस्जिद स्कूल सभी, जाना हरिजन... »

श्रधांजलि

आवो ! हम सब नमन करें भारत के वीर सपूतो का ! जिनने आज़ादी के हवन कुंड में अपना सब कुछ होम दिया आवो ! हम सब नमन करें भारत के वीर शहीदों का ! जो नित्य बलिदान दे रहे सीमा पर अपने प्राणों का ! आज़ादी की रक्षा खातिर आवो उनकी आवाज़ सुने पर्वतों के पार से सीमा के हम पहरेदार पड़े रहते खुले मैदानों में नंगी चट्टानों पर बर्फ की सिल्लियों पर या कभी धूल रेत के कोमल गद्दों पर चाँद तारों की महफ़िल को निहारते साथ ही न... »

अलख जगाआकाश

तन कुँआ मन गागरी, चंचल डोलत जाय ! खाली का खाली रहे, परम नीर नहिं पाय !!   मोती तेरा नूर मैं, देखूं चारों ओर ! धरती नभ चारों दिशा, तू ही तू ही सब ओर !!   माया विष को खाय के, मोती पड़ा अचेत ! लाख जतन मैंने कियो, फिर भी भयो न चेत !!   सात रज़ाई ओढ़ के, मैं सोअत दिन रात ! साँझ समय आवत दिखा, दुलहा संग बारात !!   शोर मचा आवत पिया, चढ़कर पवन तुरंत ! रोवत दुल्हिन चल पड़ी, बाँह पसारे संग !! ... »

अलख जगे आकाश

तन कुँआ मन गागरी, चंचल डोलत जाय ! खाली का खाली रहे, परम नीर नहिं पाय !!   मोती तेरा नूर मैं, देखूं चारों ओर ! धरती नभ चारों दिशा, तू ही तू ही सब ओर !!   माया विष को खाय के, मोती पड़ा अचेत ! लाख जतन मैंने कियो, फिर भी भयो न चेत !!   सात रज़ाई ओढ़ के, मैं सोअत दिन रात ! साँझ समय आवत दिखा, दुलहा संग बारात !!   शोर मचा आवत पिया, चढ़कर पवन तुरंत ! रोवत दुल्हिन चल पड़ी, बाँह पसारे संग !! ... »

अलख जगा आकाश

‘मोती’ रोवत थान पर, माई गयी आकाश ! किसकी माई कब गयी, वह तो तेरे पास !!   अलख जगा आकाश में, सुना जो भागत जाय ! बाकी सब नाचत फिरें, जग माया के साथ !!   काँव-काँव कौआ करे, उसका दिया सन्देश  ! एक रात बस ठहर कर, निकल दूसरो देश !!   निज स्वरुप को त्याग कर, नदिया बनी समुंद्र  ! जीव मिला पर्ब्रम्हा से, धरा ब्रह्मा का रूप !!   मोती न आवत दिखा, न जाते कोई देख ! जाते हल्ला हो उठा, ना जाना... »

अलख जगा आकाश

करुणा की बारिश हुई, लथपथ हुआ शरीर ! देहियां में दीपक जला, लउका परम शरीर !!   एक रूप सब में बसा, एक ही बना अनेक ! सागर गागर में दिखे, सूरज एक अनेक !!   कमल खिला आकाश में, देहियां हुआ अंजोर ! अमृत टपका पहर भर, फूल खिले चहुँ ओर !!   नश्वर सुख संसार का, अनजाने दुःख पाय ! जो ‘मैं’ को जाने, मिले परमानन्द प्रकाश !!   बूँद-बूँद सागर बना, कण-कण बना पहाड़ ! जो जाने सागर बने, ध... »

अलख जगा आकाश

जंगल नाचत मोर है, अंगना नाचत भोर ! मैं नाचत-नाचत थका, तब तनि हुआ अंजोर !!   मनुआ माया में फंसा, भूला अपनी राह ! गहरी खाई में गिरा, राम मिले न राह !!   साधु तपता धूप में, मल-मल आग नहाय ! सत्य नाम को ना गहे, राम कहाँ से पाय !!   जोग जतनबहु विधि किया, घर में रखा छिपाय ! न जाने कैसे घुसा, कब ले गया उड़ाय !!   शबनम गिरी आकाश से, बिखरी धरती आय ! कुछ मेरे अंगना गिरी, अंगना हुआ प्रकाश !... »

अलख जगा आकाश

पृथ्वी और आकाश में एक पुरुष का वास ! कण-कण जिससे व्याप्त है, जीवन, मृत्यु, प्रकाश !!   पूरब कोई पश्चिम कहे, पृथ्वी और आकाश ! कण-कण में मुझको दिखे, आगे पीछे  पास !!   कर्म मध्य वह व्याप्त है, निराकार साकार ! गुण-अवगुण से परे है, तत्व-तत्व आधार !!   किसकी पूजा मैं करू, किसके गाऊं गीत ! मेरे भीतर व्यापत है, मेरा प्रियतम मीत !!   प्यासा मूरख क्यों खड़ा, चल नदिया के पास ! पथ की चिंता... »