Manoj, Author at Saavan - Page 2 of 8's Posts

मुक्तक

विविध उलझनों में जीवन फंसा हुआ है किंचित ही दिखने में सुलझे हुए है लोग | स्वार्थ की पराकाष्ठा पर सांसे है चल रही अपने बुने जंजाल में उलझे हुए है लोग || उपाध्याय… »

मुक्तक

जमीं वही है मगर लोग है पराये से जो मिल रहे है लग रहे है आजमाये से! शफक नही नकॉब में फरेब है मतिहीन सभी दिखते मुझे हमाम में नहाये से!! उपाध्याय… »

कविता

कविता

मस्जिदों में काश की भगवान हो जायें मंदिरों में या खुदा आजान हो जाये ! ईद में मिल के गले होली मना लेते काश दिवाली में भी रमजान हो जाये !! बाअदब मतिहीन मिलते मौलवी साहब पूरोहित पंडित का भी सम्मान हो जाये जुर्मकारी को जेहादों को दफन कर दें इंसा अल्ला ये पुरा अरमान हो जाये || उपाध्याय… »

मुक्तक

चुभेगा पांव में कांटा तो खुद ही जान जायेगा जो दिल में दर्द पालेगा तड़प पहचान जायेगा | किसी की आह चीखों को तवज्जो जो नही देता जलेगा जब कदम अपना तपन वह जान जायेगा || उपाध्याय… »

Shayari

दर्द है आह! है मोहब्बत में मजा भी तो है इश्क गुनाह है मुसीबत है सजा भी तो है ! दो दो जिस्म में एक जान है रजा भी तो है जिन्दगी है यही फिर भी ये कजा भी तो है !! उपाध्याय… »

मुक्तक

थी मोहब्बत दिल में पहले हो गई नासूर अब पूछता न था कोई पर हो गई मशहूर अब ! उसका दिल रखने हजारों दे दिया कुर्बानियाँ और ओ फितरत से अपने हो गई मगरूर अब !! उपाध्याय…. »

मुक्तक

लोगों की बातों में आकर मुझको ना तुम निराश करो मैं प्रणय निवेदन करता हूँ बस इतनी पूरी आश करो | वे भी उन्मादी प्रेम रथी पर में पर वंचन करते है सो हृदयंगम कर प्रीत मेरी मत इसका उपहास करो || उपाध्याय… »

मुक्तक

एक मुक्तक चढा सूरज भी उतर जायेगा तपन पर मेघ बरस जायेगा | देख अंधेरा धैर्य को रखना तिमिर को चीर प्रकाश आयेगा || उपाध्याय… »

मुक्तक

ये आँखे मेरी निर्झर जैसे झर जाती तो अच्छा होता जिग्यासा दर्शन की मन में मर जाती तो अच्छा होता | तुम पथिक मेरे पथ के ही नही तुम दूजे पथगामी हो मेरे पागल मन से यह प्रीत उतर जाती तो अच्छा होता || उपाध्याय… »

कविता

खुली हुई खिड़कियों से झांकते ही रह गये कट गया कोई मनहूस ताकते ही रह गये | गिरने का हद बढता गया जाना नही कभी गैरों की बस औकात आंकते ही रह गये || अपने भले की बात में कुछ ना रहा खयाल औरों की हसरतों कुचलते ही रह गये | ऊँचाइयों पर पहुंच देखा पैरहन मतिहीन कुछ भी न आया हाथ बस मलते ही रह गये || उपाध्याय… »

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