Manoj, Author at Saavan's Posts

मैं निरीह…

मैं निरीह…

वह मुझे बताता है  निरीह  निर्जन  निरवता वासी हूँ जब से मानव मानव न रहा मै बना हुआ वनवासी हूँ | अवतरण हुआ जब कुष्ठमनन कुंठा व्याप्त हुआ जग में तब विलग हो गया मै जग से अब एकांत का वासी हूँ || मैं शुन्यकाल के अनुभव का साक्षी क्या तुमको बतलाऊँ मैं साधक सूने का मतिहीन मैं आत्मदर्श अभिलाषी हूँ | तुम तीर्थभ्रमण करते हो व्यर्थ सब व्याप्त तुम्हारे अंतर में आए जो हुए मुझ में विलिन  देखे मै मथुरा काशी हूँ ||... »

चंद शेर और मतले

चंद शेर और मतले

समेटता हूँ बिखरते ख्वाब को सजाता हूँ रोज तकदीर को लिखता हूँ और मिटाता हूँ | जो मद में चूर हो भूले है अपने ओहदे को आईना देकर उन्हे उनकी जगह दिखाता हूँ || हवा हूँ मैं खुला ये आसमा वतन है मेरा घरौदें फिर भी रोज रेत का बनाता हूँ | मै आसमां का एक टूटा हुआ सितारा हूँ वजूद कुछ भी नही है फिर भी जगमगाता हूँ || उपाध्याय… »

मुक्तक

मुक्तक

फिरे तो सरफिरे है आग ही लगा देंगे पाक नापाक का नामो निशां मिटा देंगे | हमें ना खौफ कोई तोप या संगीनों का लडे तो ईंट से फिर ईंट ही बजा देंगे || भारत माता की जय उपाध्याय… »

आज इम्तेहां है

आज इम्तेहां है

आज जज्बे का इम्तेहा होगा कल कदमों में ये जहाँ होगा | आज काश्मीर जीत लेना है कल कब्जे में पाकिस्तां होगा || न धौंस दे मुझे ऐ दहशतगर्दी कल न तेरा नमो निशां होगा | जब भी इतिहास कोई देखेगा पाक नापाक था बयां होगा || मेरे दीवार से टकरा ले मगर कल तू इसमें कही दबा होगा | किया पैदा तुझे जिसने बेअदब उसके कदमों में तू पडा होगा || लहू से खेलने का शौक तूझे कल लहू में तू नहा रहा होगा | हमे मिटाने का सपना ना देख... »

कविता

कविता

मेरा देश महान घनघोर घटा में अलख जगा कर देख रहा मतिहीन, जाग सका ना घन गर्जन पर जग सोने में लीन, इस निस्तब्ध रजनी में मै और मेरा स्वप्न महान, खोज रहा अधिगम जिससे जग सच को लेता जान ! देह थकी तो बहुत जरूरी है उसको विश्राम किन्तु न चिंतन को निद्रा गति इसकी है अभिराम | जला हुआ है दीप तो एक दिन उजियाली लायेगा अंधकार से मुक्त मही को लौ भी दिखलायेगा गंगा के तट बैठ पुरवैया के मस्त हिलोरे माँझी की गीतो में क... »

मुक्तक

मुक्तक

“मुक्तक” आओ अतीत के हम झरोखो में झांक लें जरा उनके और अपने करम को हम आंक लें जरा | जो मर मिटे वतन पे हमे स्वाधीन करने के लिये आओ शहीदों को हम आज याद तो कर लें जरा || उपाध्याय… »

झूकने न देंगे तिरंगे को हम

झूकने न देंगे तिरंगे को हम

दिनांक-२०-७-२०१६ विधा- गीत संदर्भ- स्वतंत्रता दीवस तर्ज- बहुत प्यार करते है तुझसे सनम… …………………………………………………… झूकने न देंगे तिरंगे को हम-२ हमको हमारी भारत माता की कसम -२ झूकने न देंगे तिरंगे को हम-२ हमे मातृभूमि अपने प्राणों से प्यारी-२ हम है दुलारे ये है माता हमारी -२ सब कुछ... »

कविता

कविता

चलो चले … किसी नदी के किनारे किसी झरने के नीचें | जहाँ तुम कल कल बहना झर झर गिरना और… और मैं मंत्रमुग्ध हो झरनों की लहरों की अंतर्धव्नि से राग लेकर लिखता जाऊँगा | चलो चले… किसी उपवन में या कानन में ! वहाँ तुम कोयल से राग मेल करना या पपीहे के संयम को टटोलना और मैं उन संवेदनाओं की लडी अपनी कविता रूपी माला में पीरो कर तुम्हारा श्रृंगार करता रहुंगा | चलो चले… सागर के तट पर तुम ... »

मुक्तक

मुक्तक

मित्रता बड़ा अनमोल रतन मैं कर्ण और तु दूर्योधन | मैं बंधा हुआ एक अनुशासन तु परम् स्वतंत्र दु:शासन || उपाध्याय… »

मुक्तक

विविध उलझनों में जीवन फंसा हुआ है किंचित ही दिखने में सुलझे हुए है लोग | स्वार्थ की पराकाष्ठा पर सांसे है चल रही अपने बुने जंजाल में उलझे हुए है लोग || उपाध्याय… »

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