Kunal Prashant, Author at Saavan's Posts

चांद की चमक

चांद की चमक और तुम्हारी मेहक एक सी है दोनों मुझ तक पहुंच जाती है लेकिन लौट न जा पाती है और तू है की मुझे समझ ही नहीं पाती है इतना क्यों इतराती है!! ये जो तेरी आंखे है मुझे बहुत सताती है कभी हसाती है तो कभी रुलाती है आखिर में न जाने मुझे अकेला छोड़ जाती है »

”  न जाने कितनो का हाथ वही    “

निर्मम सिमट सिकुड़ वो सोया था अंधेरे चौराहेे चौखट पे वो खोया था चादर ओढ़े सिर छुपाए, पांव फिर भी निकली थी सन सनाती हवा चली पैरो को छू, निगली थी कांप गए बदन मेरे देख वो एहसास क्या बीती होगी उसपर जब टूटे हो जज़्बात मन न माना जी मचला चला पूछने बात  देख, फिर रह गया ये मेरे मन की बात क्यों बैठे हो ,क्या हुआ है , कहा से आए हो कहा ना एक शब्द, पर समझ गया क्यों है वो स्तब्ध शायद भूखा था,आंखे बन्द कर रो रहा... »