ज्योति कुमार, Author at Saavan - Page 2 of 16's Posts

पैसे की चाहत,

पैसे की चाहत ने अपनो से दुर किया, माँ ,पिता, दोस्त ,भाई जैसे पवित्र रिस्ते को छोड़ दिया , पैसे की चाहत ने अपनो से दुर किया , जेपी सिह »

तुमसे मिलने की तमन्ना।

तुमसे मिलने की तमन्ना अब भी लगा बैठा हूँ,, सुबह से शाम तुम्हारी गलीयो मे चक्कर लगा –लगा कर दिल को समझा रहा हूँ, तुमसे मिलने की तमन्ना अब भी लगा बैठा हूँ, बीत गई वो दिन- बीत गई बात लेकिन क्या कहूँ हाथ मे सिन्दुर लिये बैठा हूँ, तुमसे मिलने की तमन्ना—– रात को जब तन्नहाई होती है करवट बदल सिसक-सिसक कर सुबह हो जाती , क्या कहूँ मिलने की तमन्ना अब लगा बैठा हूँ । – जेपी सिह »

काश

काश मेरी जिन्दगी मे तु होती ना सुबह का इंतजार करती ना शाम का शिर्फ तेरे नीले आँख ो का इंतजार करती। जेपी »

जहजे दिल।

जहजे दिल को सभाँरने का काम कर रहा, जेपी अपनो का कीमत अपनो से दे रहा। जेपी सिह »

क्यो कुछते हो परतीभा के परतीभाओ को ।

क्यो कुछते हो परतीभा के परतीभाओ को ।

क्यो कुचलते हो परतीभा के परतीभाओ को, चंद पैसो के लिए तुम्हारे घर खुशी जाती पैसो की,, यहाँ परतीभा वाले बच्चे की लाशे मिलते नदी या रेल किनारे मे,, क्यो कुचलते हो चंद पैसो के लिए,, JP singh »

आ जाओ,

आ जाओ सावन की ये वर्षात तुझे बुला रही है तेरे बीना ये सावन की बुँद मुझे जला रही है। Jp singh »

मुझे नही पता,

मुझे नही पता की फुल के तरह खिलुगाँ, भवरे आयेगे नोच– नोच-खायेगे, मेरी कोमल तन को पत्थर की चोट से घायाल करके मेरे बदन को नोच- खायेगें मुझे नही पता भवरे नोच खायेगे,, किसको गलत कहूँ, ये परिन्दे मेरे शहर मे हर घर के छत पे नजरे तलाश करते, लम्बी-लम्बी बात बोल-बोलकर मुझे पंछी की तरह जाल मे फसाकर , मुझे नोच खाते किसको कहूँ मेरे शहर के ही परिन्दे मुझे नोच खाते।। सात- फेरे की कसम खाकर मुझे बुलाकर चार-प... »

अगर मै कुड़ा कागज होता,

अगर मै कुड़ा कागज होता,

अगर मै कुड़ा-कागज होता , तो मेरा कोई ना सुबह होता ना शाम होता, ना घर होता ना परिवार होता, शिर्फ मेरे साथ रास्ते का धुल होता,,,,, अगर मै कुड़ा–कागज होता, कभी पढ़ने का काम आ जाता कभी बच्चे के खेलने मे काम आ जाता ,, अगर मेरी अस्तीत इंसान के बीच खत्म भी हो जाती ,, तो मै किसी काबारी को भी काम आता!! ,अगर मै कुड़ा -कागज होता_, ना मेरी कभी अंत होती !! मुझे फिर से नया बनाया जाता कभी अफसरो के बीच कभी ... »

मानव तुम्हारा हजार रूप देखे,,

मानव तेरा हजार रूप देखे,, कभी रावण बनते कभी कंश बनते देखे, कभी राम बनते देखे कभी Krishna बनते देखे,, लेकिन जब -जब देखे सच्चाई पर मरते देखे, मानव तेरा हजार रूप देखे।। जे पी सिह »

दिव मे,

दिल मे कुछ अरमान सजाये बैठे है, आँखो मे कुछ ख्वाब रखे बैठे है,, तेरी डोली को देखने की इंतजार मे मेरे दिल और आँख वर्षो से किसी मोड़ पर बैठे है।। जे पी सिह »

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