Jagmohan kandari, Author at Saavan's Posts

स्वैत आँचल को तेरे चेहरे से छिटकते देखा है

स्वैत आँचल को तेरे चेहरे से छिटकते देखा है

स्वैत आँचल को तेरे चेहरे से छिटकते देखा है बरसात के बाद चटक धूप मैं तुझे खिलते देखा है सुआपंख साड़ी को तेरे तन से लिपटते देखा है वो भीनी-भीनी,वो सोंधी-सोंधी खुशबू तेरे तन की इन हवाओं मैं बड़े करीब से महसूस किया है मैंने पहाड़ मेने तुझे दुल्हन की तरह सजते देखा है »

ए खुदा ख्वाइशों का समंदर कम कर दे

ए खुदा ख्वाइशों का समंदर कम कर दे इस तपते जिगर को बारिश मैं धुंआ कर दे दिल मैं जो अरमान से उठते हैं तू किसी पत्थर के तले उनको दफन कर ले जुगनू सा चमकने कि जो ख्वाइस थी तू स्याह अंधेरों मैं उसे कही गुम कर दे ये जो पॉव चलते है मंज़िल की तरफ तू पत्थरों की ठोकर से लहू कर दे ये जो अरमान जीने के बाकी है तू किसी कब्र मैं इनको दफन कर दे जिंदगी के इस लंबे सफर को इन रास्तों मैं कही गुम कर दे ये जो फ़ितरत है तु... »

प्यार कभी एक तरफा नही होता

प्यार कभी एक तरफा नही होता ना होगा दो रूहों के मिलान की जुड़वा पैदाइश है ये बहता दरियां है बस बहता रहता है प्यार सिर्फ एक जिस्म से पैदा नही होता मैं और तुम से एक रूह तक का सफर होता है बस पैदा होता है दो जिस्मो मैं और बढ़ता जाता है, पर बूढ़ा नही होता प्यार एक खुश्बू है जिसकी, कोई पहचान नही बस एक अहसास है, प्यारे से रिस्ते का प्यार कभी एक तरफा नही होता ना होगा दो रूहों के मिलान की जुड़वा पैदाइश है ये »

पुरानी किताबो के पन्ने पलटकर देखो

पुरानी किताबो के पन्ने पलटकर देखो इश्क़ की गहराइयो मैं खुद उतरकर देखो इश्क़ से गहरा समंदर भी नही बस एक बार आज़माकर देखो चंद लम्हो मैं तय होगा चाँद का फासला एक बार फासला मिटाकर देखो मेरा चमन कुछ बीरान सा पड़ा है बीरानियो में खुशबुए बहार बनके देखो घुप अंधेरे रास्तों से गुज़र रहा हूँ उम्मीद का जुगनू सा चमककर देखो उम्मीदों का दिया जलाना है अभी तुम बाती बनकर तों देखो मुरझाने सा लगा है मेरे बाग का बूटा सावन ... »

बड़े दिनों मैं कुछ फुर्सत सी मिली हैं

बड़े दिनों मैं कुछ फुर्सत सी मिली हैं, कलम फिर हाथ में लेने की, चाहत सी हुई है। कोई मंज़र घटा या फिर कोई बात हुई? या फिर दुनियां ए दस्तूर लिखने की चाहत हुई, क्या उनकी रहनुमाई कुछ असर कर गयी, जो हमपर फिर गालिबी उत्तर आई। या फ़िर गुफ़्तगू मैं कुछ ख़ालिस रह गयी, या जुगनू से चमकने की ख्वाइश कुछ, अधूरी सी रह गयी। क्या चाँद की चांदनी मैं कुछ खलल सा पड़ा है, या सितारों की चमक मैं कुछ दखल सा पड़ा है, क्या कोई आं... »