हेमा श्रीवास्तव 'हेमाश्री', Author at Saavan's Posts

पहचान

शरद की बारिस में, शुभ्र प्रभा भीग रही है, एकांत से आँगन में , वो खड़ी सोच रही है, वह आभास कहाँ? जो मिथक मिटाये, खाली दालान पड़ा, कौन हक् जाताये? मिट्टी की ये महक अब सोंधी नही रही चिरैया की ये चहक अब मीठी नही लगी उपले पर उगी घास गाय भी बूढ़ी हो गई खत्म है भूसा पुआल बंजर भूमि नही रही, छप्पर और तिरपाल खपरैल भी उतर गए पगडंडी और सिवान सड़को में बदल गए पहले आती थी ,जब गाँव मुस्कुराता मिला जैसे खुशहाल थे सब ... »