Dharmendra Rajmangal, Author at Saavan's Posts

ऐसा वक्त कहाँ से लाऊँ

ऐसा वक्त कहाँ से लाऊँ

कविता – ऐसा वक्त कहाँ से लाऊं वेफिकरी की अलसाई सी उजली सुबहें काली रातें हकलाने की तुतलाई सी आधी और अधूरी बातें आंगन में फिर लेट रात को चमकीले से तारे गिनना सुबह हुए फिर सबसे पहले पिचगोटी का कंकड़ चुनना मन करता है फिर से मैं एक छोटा बच्चा बन जाऊं जो मुझको बचपन लौटाए ऐसा वक्त कहाँ से लाऊं. बारिश के बहते पानी में छोटी कागज नाव चलाना आंगन में बिखरे दानों को चुंगती चिड़िया खूब उड़ाना बाबा के कंधों ... »

ऐसा क्यों है

ऐसा क्यों है

चारो दिशाओं में छाया इतना कुहा सा क्यों है यहाँ जर्रे जर्रे में बिखरा इतना धुआँ सा क्यों है शहर के चप्पे चप्पे पर तैनात है पुलिसिया फिर भी मचा इतना कोहराम सा क्यों है. मिलती है हरएक को छप्पर फाड़कर दौलत फिर भी यहाँ मरता भूख से इंसान सा क्यों है चारो तरफ बिखरी हैं जलसों की रंगीनियाँ फिर भी लोगों में इतना अवसाद सा क्यों है. हर कोई मन्दिर मस्जिद में जा पुण्य कमाता फिर भी बढ़ता यहाँ इतना पाप सा क्यों है... »

क्या बताता

क्या बताता

 कविता—क्या बताता तब आधी रात होने की कगार पर खड़ी थी लेकिन वो थी कि अपने सवाल पर अडी थी पूंछती थी कितनी मोहब्बत मुझसे करते हो सब झूठा खेल है या सच में मुझपर मरते हो यह सवाल उस वक्त जब सारी दुनिया सोती है कैसे बताता क्या इश्क दिखाने की चीज होती है |1| रह रह कर उसका पूंछना मुझे मारे डालता था पता नही कैसे उस वक्त खुद को सम्हालता था खुबसूरत तो थी वो लेकिन बुद्धू भी खूब थी कुछ भी हो जालिम जमाने वो... »

बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना

बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना

जन्म लेकर साथ तुम मेरे पली थी भेदभावों के समन्दर में वहीं थीं में पला नाजों से लेकिन तुम नहीं कौन कहता पीर मन की अनकहीं पूज्या कहकर लड़कियों की कैसी साधना बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना|1|   मैं पढ़ा, लेकिन रही तुम अनपढ़ी मैं खड़ा आगे रही तुम पीछे बढ़ी मैंने जो भी माँगा वो मुझे मिला लेकिन तुमसे ये कैसा सिला चंचला तुम आगे से लड़की होना न मांगना बहन तुम मुझे इस बार राखी न बांधना |2|   मैंने म... »