Anshita Sahu, Author at Saavan's Posts

दुनिया का मेला

दुनिया का मेला

तन क्या मिट्टी का ढेला जीवन नश्वर कुछ पल का खेला फिर भी क्यों तू इतराता है नहीं टिकेगा ये दुनिया का मेला »

फ़र्ज़ राखी का

फ़र्ज़ राखी का

न था मित्र कोई सखा मेरा जन्मा था वो बनके दोस्त मेरा। पहली दफा मुस्कुराया वो, मन प्रफुल्लित हुआ था मेर। जैसे गुड़हल के पुष्प से निकली हो एक कली और लुटाई हो उसने सुंदरता मुझपर। कदम धरती पर रखा था उसने और बरसाया था अपना मोहन मुझपर। गयी थी मई पीया के, मन संकुचित हुआ था मेरा; होगा कैसा वो मन रूखा हुआ था मेरा। नग्न आँखों ने निहारा था उसे हेमन्त बरसा था नयनों से मेरे। जब विदा हुई थी मैं आंसू सुख गए थे मेर... »