Aniruddh Trivedi, Author at Saavan's Posts

सार्थक भाव विक्षेप

अवसाद का विक्षोभ नीरव, चपल मन का क्लांत कलरव देखता पीछे चला है लगा मर्मित स्वरों के पर । शुष्क हिम सा विकल मरु मन, भासता गतिशील सा अब, भाव ऊष्मा जो समेटे बह चला कल कल हो निर्झर। विगत कल में था जो मन मरु और अस्तु प्रस्तर, विकलता का अमिय पी फूटा था अंकुर। हूँ अचंभित आज मै खुद, पा वो खोया अन्तः का धन, धन की जो था विस्मृत सा, मन विपिन में लुट गया था, स्वार्थ और संकीर्णता के चोर डाकू ले उड़े थे। आज लौटा... »