Anil Goyal, Author at Saavan's Posts

जरुरी तो नहीं

ये सही है कि तवायफों का जिस्म बिकता है , मगर ईमान भी बिकता हो – जरुरी तो नहीं . ये सही है कि उनसे गलतियाँ हजारो हुई है रिश्ता निभाने में, मगर हर मर्तबा हम ही सही हो – जरुरी तो नहीं . ये सही है कि दिल टूट जाने के डर से कई बार सच नहीं बोला जाता , मगर हर झूठ दिल जीत ही ले – जरुरी तो नहीं .  अनिल कुमार भ्रमर »

जब कभी

सपने में भी जब कभी तुम्हारा ख्याल आता है तो – दर्द से तड़फ कर जाग जाता हूँ मै  . जब अंधेरो के सिवा कुछ मिलता नहीं वहां तो- खुद ही खुद से घबरा जाता हूँ मै . कभी गैर आकर रुला जाते है मुझको  तो- कभी खुद की ही हरकतों से परेशां हो जाता हूँ मै . आती नहीं जब कभी नींद रात को तो- खुद ही खुद को थपकियाँ देकर सुलाता हूँ मै . अनिल कुमार भ्रमर   »

पहले शख्स

तुम पहले शख्स हो – जिसे मैंने अपना हमराज बनाया है, अपना हाले दिल सुनाया है, वरना मुझे किसी पर एतबार नहीं . तुम गैर मानुस हो अभी- फिर भी लगता है बरसो से जानता हूँ तुम्हे, पहली मर्तबा किसी को दोस्त कहा , वरना मेरा कोई यार नहीं . गुबार ए जज्बात बिखेर कर तुम पर- बहुत हल्का महसूस कर रहा हूँ खुद को , आज बैठ  कर तुम्हारे साथ दो घूंट पीऊंगा मै, वरना मुझे जाम से प्यार नहीं . –अनिल कुमार भ्रमर &... »

अभी अभी वो वर्तमान थे , अभी अभी वो अतीत हो गए . वो कौन थे ? किसके थे वो ? प्रश्न सब बेमानी बेकार हो गए . ना वो थे किसी के, ना बाकि किसी के लिए रह गए . मिटटी से बने थे वो, बस मिटटी में शामिल हो गए. »

हमने तो

कुछ शब्द  कहे थे हमने तो, वो शब्द जाने कब – लोगो कि जुबान पर चढ़ गए और किस्से हो गए . हम तो सभी के थे , जाने कब हम – बट गए उनके दिलो में और मेरी जिंदगी के कितने हिस्से हो गए . »

टूटता जा रहा हूँ मै

टूटता जा रहा हूँ मै . छूटती हुई राहें-बढ़ता हुआ अँधेरा, भटकता जा रहा हूँ मै . टूटता  हुआ किनारा-उमड़ता हुआ सागर , डूबता जा रहा हूँ मै . समाज का बंद कमरा-कमरे में मै अकेला, घुटता जा रहा हूँ मै . जिंदगी कि बेवफाई-निराशा कि गहराई, टूटता जा रहा हूँ मै . टूटता जा रहा हूँ मै . -अनिल कुमार भ्रमर – »

जज्बात ए इश्क

जज्बात ए इश्क ना छुपाता दिल में अपने – गर ना होता डर ज़माने का . नहीं डरता ज़माने से भी में – गर डर ना होता मर जाने का . मर भी जाता मै – गर मेरी मौत से तेरी जिंदगी बन जाने का यकीं होता.. »

बर्दाश्त नहीं होता

तुम्हारे जाने का दर्द क्यों ना हो ए ख़ुशी, हमसे तो दुखो के जाने का दर्द भी – बर्दाश्त नहीं होता . तुम्हारी चुप्पी सहन कैसे हो ए दोस्त, हमसे तो दुश्मनों का चुप रहना भी- बर्दाश्त नहीं होता . तुम्हे जलन थी हमसे, तुम्हारे जलने का दर्द क्यों ना हो ए महजबीं, हमसे तो रात के चिराग का जलना भी – बर्दाश्त नहीं होता .       »

किसके लिए

राह में गढ़ी है नजरें – मगर किसके लिए ?   दूर दूर तक कोई नजर आता नहीं , हर तरफ है अँधेरा ही अँधेरा, मै रौशनी कर तो लूँ – मगर किस के लिए ?   जो मेरे साथ चले थे वो निकल गए आगे, जो मेरे बाद आये थे वो भी निकल गए आगे, मै रुक कर इन्तजार कर तो लूँ – मगर किस के लिए ?   -अनिल कुमार भ्रमर –       »

2 मुक्तक

1- तुम आये तो बिना पिये ही बेहोशी का अहसास करते है , वर्ना तो मयखाने कि सारी मय पीकर भी होश बाकी था हमको I   2-पीते तब भी थे , पीते अब भी है , फर्क फकत इतना है साकी – कि तब तेरे साथ बैठ कर पीते थे, अब तेरी याद में पिया करते है I   »

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