गिरते गिरते ही सम्भलते हैं सब

गिरते गिरते ही सम्भलते हैं सब
फ़िर कहीँ आगे निकलते हैं सब

ऐसे क़ाबिल तो नहीँ बनता कोई
पहले जलते हैं पिघलते हैं सब

कौन बच पाया हमें बतलाओ
दिल जवानी मॆं फिसलते हैं सब

दिल को मिलता है महब्बत से सुकूँ
वरना बस आग उगलते हैं सब
अपनी खुशियों का तो इज़हार नहीँ
दर्द आँसूओं मॆं ढलते हैं सब

मैं हूँ मिट्टी का तराशा इंसा
हीरे कानों से निकलते हैं सब

आज़ भी देखो वही है आरिफ
वक़्त के साथ बदलते हैं सब
आरिफ जाफरी


लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 
यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|
 
poet from heart!!

7 Comments

  1. Panna - May 15, 2016, 5:40 pm

    nice

  2. Usha lal - May 15, 2016, 1:22 pm

    Nice!!

  3. Profile photo of Kavi Manohar

    Kavi Manohar - May 15, 2016, 1:01 pm

    Wah…bahut. Khoob

Leave a Reply