ग़ज़ल

इक समंदर यूं शीशे में ढलता गया ।
ज़िस्म ज़िंदा दफ़न रोज़ करता गया ॥

ख़्वाब पलकों पे ठहरा है सहमा हुआ ।
‘हुस्न’ दिन-ब-दिन ख़ुद ही सँवरता गया ॥

‘इश्क़’ है आरज़ू या कि; सौदा कोई ।
दिल तड़पता रहा -— दिल मचलता गया ॥

क्या हो शिक़वा कि; ‘अनुपम’ यही ज़िन्दगी ।
‘ज़िंदा’ रहने की ख़ातिर ‘मैं’ मरता गया ॥
#anupamtripathi #anupamtripathiG
———- गोयाकि; ग़ज़ल है ! ———-

Previous Poem
Next Poem
Spread the love

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

2 Comments

  1. ज्योति कुमार - July 5, 2018, 9:31 am

    वाह

  2. राही अंजाना - July 7, 2018, 11:21 pm

    वाह

Leave a Reply