सुनो अमृता!

सुनो अमृता!

सुनो अमृता!
अच्छा हुआ
जो तुम लेखिका थी
क्योंकि अगर तुम लेखिका न होती
तो निश्चित तौर
तुम्हें चरित्रहीन और
बदलचलन की श्रेणी में रखा जाता।

अच्छा हुआ तुम असाधारण थी
क्योंकि साधारण स्त्रियों की ज़िंदगी में
तीन-तीन पुरुषों का होना
वैश्यावृत्ति माना जाता है

अच्छा हुआ अमृता
तुम बोल्ड थी
इसीलिए तुम्हारे मुंह पर
किसी ने कुछ न कहा
किन्तु यह भी सत्य है
आज इमरोज की कामना करने वाली
कोई भी स्त्री अमृता बनना नहीं चाहेगी
क्योंकि दहलीज़ों को लांघना
कोई मज़ाक नहीं है।

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4 Comments

  1. ashmita - January 22, 2018, 5:26 pm

    Nice poem

  2. Anirudh sethi - January 22, 2018, 10:23 pm

    well said!

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