समझ

किसी सांचे में भी ढल नहीं पाया हूँ मैं,
शायद ठीक से ही बन नहीं पाया हूँ मैं,

वक्त बेशक ही लगा है मुझको बनाने में,
पर सच है खुद को बदल नहीं पाया हूँ मैं,

तोड़ा-जोड़ा भी गया हूँ कई बार ऊपर से,
कभी भीतर से मगर संभल नहीं पाया हूँ मैं,

मैं रिश्तों से हूँ या रिश्ते मुझसे हैं कायम,
उलझन ये है के कुछ समझ नहीं पाया हूँ मैं॥
राही (अंजाना)

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2 Comments

  1. ज्योति कुमार - November 28, 2018, 7:15 pm

    सुन्दर ।

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