विचारों को जब

विचारों को जब बाँध रही थी,

अरमानों के साँचे ढाल रही थी,

खिन्न हुई, उद्वगिन हुई  जब,

खुद को मैं आँक रही थी ।
विचारों को खोल  चली जब,

निरन्तर  प्रवाह से जोड़ चली जब,

आशा-निराशा  छोड़ चली जब,

जीवन संग आन्नदित हूँ।
कर्तव्यो की जो होली है,

रंग-बिरंगी  आँख मिचोली है,

संग मैं हूँ, जीवन की जो भी बोली है ।।

https://ritusoni70ritusoni70.wordpress.com/2016/10/15/


 


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8 Comments

  1. Profile photo of Ria

    Ria - November 30, 2016, 9:28 pm

    बहुत खूब

  2. Profile photo of Nomi Khan

    Nomi Khan - October 16, 2016, 2:27 pm

    Nic view, and this poetry can be converted into ronam, than I can b read too

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