राघवेन्द्र त्रिपाठी

राघवेन्द्र त्रिपाठी

हर रास्ता हमसे तंग हुआ, हम फिर रास्ते की तलाश मे निकले ,
शजरो शजर की चाहत मे रास्ते महज इत्तेफाक निकले ।
ठहरे जहाँ पल भर को ब आजादी ब आबोताब ,
हमारी आबादी का जनाजा लेकर लोग सब बर्बाद निकले ।
वो इन्तजार मे था के धुन्ध छटे कोई अपना दिखे ,
रोशनी हुई तो चेहरे महफूज नकाब निकले ।
वो अपने ईमान पे अकड़ता रहा ताउम्र,
कत्ले जमीर करके लोग सर उठा बेबाक निकले ।
मुद्दत गुजरी इक हमराह की चाहत मे ,
वीराने सब अस्बाब निकले ।
दौलत औ शोहरत की चाहत मे  जिन्दगी हुई खाक ,
सल्तनत से दूर फकीर बादशाह निकले ।
दिनभर की जद्दो जहद और हकीकत की मार ,
फिर आसमा पे चाँद और सैर पे कुछ ख्वाब निकले ।
काटो ये दिल जिगर तस्वीर ए विशाल ए यार निकले ,
बहे आंखो से चश्मे तर साथ लहू के शराब निकले ।

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