मैदान ए जंग

ज़िन्दगी की जंग के मैदान में,
तुम भी खड़े हो मैं भी खड़ी हूँ।
फ़र्क है तो इतना की मैं किसी को मारना नहीं चाहती,
और तुम किसी और से मरना नहीं चाहते।

Previous Poem
Next Poem
Spread the love

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

4 Comments

  1. राही अंजाना - June 30, 2018, 3:53 pm

    Waah

  2. Neha - July 1, 2018, 10:51 am

    Nice

  3. bhoomipatelvineeta - July 1, 2018, 10:56 am

    Thank u

Leave a Reply