मैं चीखा- चिल्लया तेरी बातो से ।

वाह रे दुनिया !
मै चीखा–चिल्लया तेरी बातों से।
“हाँ” मै चीख रहा हूँ,चिल्ला रहा हूँ,मेरा कोई औकाद नही किसी पर अवाज उठाने की!
केवल जख्मों के छालों से सदा सुने है,सिसक -सिसक कर सोई है।
गरीबी की मारों से।
मेरा कोई औकाद नही तुम्हारे समाने आने का
केवल तेरी——-
बोली से सुने है दौलत के तलवारो का।
आजकाल कुछ लोग वैसे बोल रहे डर बैठे इनके जुवाओ मे।
कोई मजबुर ही समझेगा गरीबी की हत्यारो को ।
सभा के बीच जब मुँह या ना जुँबा होती पहचान ली जाती है।
गरीबी की औकादो का—-

ज्योति कुमार
मो०९१२३१५५४८१

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8 Comments

  1. ashmita - May 6, 2018, 8:25 am

    nice one

  2. Sridhar - May 6, 2018, 9:40 am

    wah bahut khoob

  3. bhoomipatelvineeta - May 6, 2018, 3:03 pm

    nice poetry sir

  4. राही अंजाना - May 6, 2018, 5:06 pm

    Shi hai

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