मुक्तक

कदम दर कदम मै बढाने चला हूँ।
सफर जिन्दगी का सजाने चला हूँ।
ज़माने की खुशियाँ जहाँ पें रखकर
दौर जिन्दगी बनाने चला हूँ।।

योगेन्द्र कुमार निषाद
घरघोड़ा

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शख्सियत मेरी घुली हुई है मेरे पराये से अहसास में शक्ल ओ अक्ल दोनों दिख जायेंगी, आईने अल्फ़ाज में..

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