मुक्तक

मैं कभी-कभी निकलता हूँ ज़माने में!
शामे–गुफ्तगूं होती है मयखाने में!
थक जाती है महफिल भी सब्र से मेरे,
वक्त तो लगता है दर्द को भुलाने में!

मुक्तककार -#मिथिलेश_राय

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1 Comment

  1. ashmita - January 27, 2018, 8:09 pm

    nice

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