बेटी

आँखों ही आँखों में जाने कब बड़ी हो जाती है
बिन कुछ कहे सब कुछ समझ जाती है
जो करती थी कल तक चीज़ों के लिए ज़िद
आज वो अपनी इच्छाओं को दबा जाती है
अब कुछ भी न कहना पड़ता है उससे
सब कुछ वो झट से कर जाती है
एक गिलास पानी का भी न उठाने वाली
आज पूरे घर को भोजन पकाती है
कभी भी कहीं भी बैग उठा कर चल देने वाली
आज वो अपना हर कदम सोंच समझ कर बाहर निकालती है।।

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By Neha

6 Comments

  1. Mithilesh Rai - May 29, 2018, 2:41 pm

    सुंदर रचना

  2. Anshita Sahu - May 29, 2018, 3:34 pm

    nice poem

  3. राही अंजाना - May 30, 2018, 7:53 am

    Waah

  4. Neha - May 30, 2018, 10:15 am

    Thank u

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