बहुत परेशान करती है तन्हा रातें हमकों।

बहुत परेशान करती है तन्हा रातें हमकों।
मुसल्सल याद आती है मुलाकातें हमको।।
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ऐसे क्यूँ ख़फ़ा हो गए बिना सबब के तुम।
क़ोई वजह थी जहन में तो बताते हमकों।।
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ख़ुद मुज़रिम होके हमें गुनाहगार कह दिया।
अपनी बेगुनाही के सबूत तो दिखाते हमको।।
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अश्कों की वज़ह बनते है ख़त मेरे अक्सर।
कहतें हो तो फ़िर क्यूँ नहीं जलातें हमकों।।
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कहना आसान है ओ वादे भी तमाम होते है।
पर क़ोई रिश्ता कहा था तो निभाते हमकों।।
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जिसे भूलना हो वो याद क्या रखता आखिर।
लेकिन कहता है तारीखें याद दिलाते हमकों।।
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2 Comments

  1. Dinesh Sharma - April 17, 2017, 11:37 am

    so nice ., maza aa gaya bhai

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