पत्र आता

तन वदन मन खिलखिलाता ,
जब किसी का पत्र आता ।

पत्र के उर में बसे हैं ,
प्रेमियों के भाव गहरे ।
दूर हों चाहे भले वे ,
पत्र से नजदीक ठहरे ।

पत्र ही ऐसा सुसेवक ,
दूरियाँ सबकी मिटाता ।

बहुत दिन तक जब किसी के ,
दर्शनों को मन तरसता ।
मीत की पाती मिले जब ,
प्यार अंतर में बरसता ।

प्यार का पानी पिलाकर ,
प्यास को पल पल बढा़ता।

जब कभी आकुल हुआ मन ,
लेखनी पर दृष्टि जाती ।
विरह-गाथा कागजों पर ,
चित्त के रूपक सजाती ।

क्या लिखूँ आगे कलम से ,
बीच में कोई रुलाता ।

पत्र के द्वारा गए हैं ,
गीत मन के मीत -द्वारे ।
गूँजते जिसके अधर पर ,
मिलन के संगीत न्यारे ।

पीक को अनुकूल क्षण में ,
स्वाँति के सीकर पिलाता ।

पत्र म सुखदुख भरा है ,
मेघ सा दृग पर सुहाता ।
सांत्वना देता स्वरों से ,
अंत में जो बरस जाता ।

आँसुओं से सिंधु बनता ,
नेह में मन डूब जाता ।


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