नए साल की नई कविता

एक नई कविता”अंग्रेजी न्यू ईयर”के आगमन पर
…समर्पित
(डा0दिलीप गुप्ता,घरघोड़ा.रायगढ़.छ0ग0)
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**स्वागत हे नव वर्ष
क्या लेकर आए हो..
विषाद की बोरियां
या बिंडलों मे हर्ष !!
या ओढ़कर भेंड़ की खाल आये हो !!
समस्याओं की नई “जाल”लाए हो !!
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हे नए साल
न आना जुबान से कंगाल…
मीठलबरा,बेशरम कर जोरे
खड़े हो जाते हो
दांत निपोरे…
झूठे आश्वासन औ वादे न दे जाना..
दे के भाषण ,गरीबों का राशन
औ पशुओं का चारा न पचा जाना !!!
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हे नव वर्ष
भ्रष्टाचार के चरमोत्कर्ष
पिछली बार,कई चमत्कार दिखलाए
कागजों में बनाई बडी बड़ी योजनाएं..
बांध नहर व् पूल
हस्पताल सड़कें व् स्कूल
योजना तो ,कागजों में
अखबार औ टी वी में नायाब थे.
पर गरीब जमीं की छाती से गायब थे!!!!!
देशी खातों में गढ़ गए.
जेबों व् पेटों की भेंट चढ़ गए..
विदेशी खातों की और बढ़ गए….?
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याद है! पिछले साल एक रात में
रिमझिम बरसात में
आफिस में लड़े थे,
सरकारी बंगले में पीकर…
धुत्त पड़े थे……
पतित पावनि गंगा के देश में
रक्षक के वेश में,,
एक गरीब,आदिवासी विधवा से
करके बलात्कार..
हो गए फरार
मत आना खबरदार
बनके ऐसे तहसीलदार !!!?
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नव वर्ष,तुम आना जरूर
पुलिस ठाणे में..
कोई पीड़ित न डरे
जुर्म के खिलाफ..रपट लिखाने में.
लुच्चों का खाकर माल..
सच्चों पे मत चढ़ जाना नए साल !
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और कहीं ऐसा न हो कि
बेआबरू हो रही हो …कोई सीता
औ तू बैठा हो
मुफ़्त की दारु पीता!
लूट जाए जब ….”सारा”
नशे में खुद भी डुबकी लगाले
बहती गंगा की धारा……
सुबह साड़ी के छोर से
पेड़ या पंखे में लटकी मिले
सीता मिले दुबारा ???
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हे नव वर्ष:इस बार दिलो दिमाग में आओ
टोपी औ कुर्सी को सद राह दिखलाओ
खा पी कारण सोए 5 साल
न कुतरें देश के नाक कान गाल
न झुकाएं देश भाल……!
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देश के अस्पतालों में जरूर आओ
हर पीड़ा का मरहम बन जाओ,,
पिछले दिनों की तरह नहीं कि…
ए सी बंगले में पी विदेशी मस्त रहे,
गरीब.डायरिया डिसेन्ट्री औ
मलेरिया की मातसे त्रस्त रहे
….मरीज क्या झूलते पर्दो को
दुखड़ा सुनाए हस्पताल में
या जोंक खटमल की तरह
रक्त चुसू प्राइवेट डॉक्टर की
शरण में जाए..नए साल में !!!??
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न रहे लूट डकैती न दंगा
रोज आना अखबारों में,
छापे रहना नित न्याय प्रेम
दुनिया के समाचारों में ,,
कोई लाज न हो सामूहिक
बलात्कार की शिकार ..
औ आरोपी अंधे कानून की
लूली पकड़ से फरार ??
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न हो कहीं कचड़ा कहीं खाई
नाली सफाई ताल खुदाई
प्रकाश ब्यवस्था सड़क सफाई
के बहाने
बन्दर भालू,कुकुर कऊवा मनमाने
सारे खातों की.. न कर दें सफाई
नगर प्रशासन के ह्रदय में
तुम जरूर- जरूर आना
हे नव वर्ष मेरे भाई !!!!!!
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रुपयों की गर्मी तो उतारा
हवेली औ जेवर भी उतार देना,
दम्भी हवशी मन की
औकात..उघार देना,
समेट कर कोई जाएगा नहीं
सच को संवार देना…
ऊपर से राम-राम
भीतर पार्टी हित के काम
न रहना मोदी साईँ
2000 जना 5000 न बना देना
टोपी-कुर्सी में भी
गांव हित-गरीब हित में आना मेरे भाई।।
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1813/15.@कॉपीराइट
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6 Comments

  1. Yogi Nishad - December 27, 2017, 6:59 pm

    बेहतरिन भैया

  2. Ritu Soni - December 27, 2017, 8:13 pm

    nice poem

  3. सीमा राठी - December 28, 2017, 12:44 am

    nice

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