देखना है की हिस्सों में कैसे बँट पाउँगा मैं। इक बूढ़ा शज़र हूँ लगता है कट जाऊंगा मैं।। ‘

देखना है की हिस्सों में कैसे बँट पाउँगा मैं।
इक बूढ़ा शज़र हूँ लगता है कट जाऊंगा मैं।।

मुझे सहारा देने में दिक्कतें तो है बच्चों को।
ख़ामोश ही रहूँगा की जब थक जाऊंगा मैं।।
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सोचा नहीं था की मुझपे भी होगी पत्थर बाजी।
जब इक फल जैसा शाख पे पक जाऊंगा मैं।।
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ज़मी ज़ायदाद तकसीम हुए तजुर्बे कौन रखेगा।
वक़्त है पूँछो अफसोस होगा जब मर जाऊंगा मैं।।
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रूह भी मेरी माँगेगी तुम्हारी सलामती की दुआएँ।
रोना नहीं जब मौत की रस्सी से बन्ध जाऊंगा मैं।।
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6 Comments

  1. Dinesh Sharma - March 12, 2017, 12:50 am

    awesome .., like a professional .., great work

  2. Profile photo of Sridhar

    Sridhar - March 6, 2017, 7:37 pm

    behatreen

  3. Profile photo of Ramesh Singh

    Ramesh Singh - March 6, 2017, 7:15 pm

    Thanks

  4. Kumar Bunty - March 5, 2017, 8:03 pm

    NAYAB

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