देखना उनकी नियत भी बे-असर हो जायेगी

देखना उनकी नियत भी बे-असर हो जायेगी,
चालबाज़ी जब हमारी कारगर हो जायेगी.

देखना है खेल मुझे साफ़ पौशाको का उस दिन,
भोली जनता जब कभी भी जानबर हो जायेगी.

बिगडे लोगो के लिए बिगडे तरीके चाहिए जी,
बदसलूकी भी हमारी तब हुनर हो जायेगी.

दुनियाँ मानेगी लोहा फ़िर हमारा सदियों तक,
जिधर चलेगे एक हो वही डगर हो जायेगी.

ढूँढ लेंगे हम आँधेरे मे सफ़र अपना हुजूर,
सूर्य की ये रोशनी भी कम अगर हो जायेगी.

हम अकेले ही चलेंगे देश की खातिर मियाँ,
चीखती चिल्लाती दुनियाँ रहगुज़र हो जायेगी.

फ़िर चलेंगे काफिले अधिकार की लडाई के,
अखबार के बस्ते भी एक खबर हो जायेगी.

फ़िर से बदलेगा जमाना नई पीडी से यहाँ,
जब इंकलाब की ज़ुबानी घर व घर हो जायेगी.

हरेन्द्र सिंह कुशवाह
“एहसास”

Previous Poem
Next Poem
Spread the love

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

Related Posts

किसी ने ग़म दिया मुझको किसी ने घोंप दी खंजर

किसी ने ग़म दिया मुझको किसी ने घोंप दी खंजर

सभी इल्ज़ाम शीशे पर ये जग कबतक लगायेगा

सभी इल्ज़ाम शीशे पर ये जग कबतक लगायेगा

7 Comments

  1. Praveen Nigam - July 7, 2016, 9:50 am

    bahut khoob

  2. Kavi Manohar - July 7, 2016, 1:35 pm

    Nice

  3. Harendra singh kushwah "aihsas" (एहसास) - July 7, 2016, 7:27 pm

    शुक्रिया दोस्तो

Leave a Reply