दर्द

मुखौटे सजाये फिर रहे हो आजकल.
दिल में जख्म़ लिये जिये जा रहे हो.
हर किसी ने ओढ़ रक्खा मतलबी नकाब.
एक दुशरे को दर्द दिये जा रहे है।
न मंसूबा मेरी जवां हसरतें मुल्तवी हो रही.
मेरी ख्वाहिशे मुखौटा बन गई है।
हसता हूंँ, सिर्फ हसाने को आपकों.
भला कौन हँसे मुखौटे लिऐ.
हम नकाब लिए जिये जा रहे.

अवधेश कुमार राय “अवध”

Previous Poem
Next Poem
Spread the love

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

1 Comment

  1. Anirudh sethi - February 4, 2018, 11:34 pm

    nice

Leave a Reply