टूटता जा रहा हूँ मै

टूटता जा रहा हूँ मै .

छूटती हुई राहें-बढ़ता हुआ अँधेरा,

भटकता जा रहा हूँ मै .

टूटता  हुआ किनारा-उमड़ता हुआ सागर ,

डूबता जा रहा हूँ मै .

समाज का बंद कमरा-कमरे में मै अकेला,

घुटता जा रहा हूँ मै .

जिंदगी कि बेवफाई-निराशा कि गहराई,

टूटता जा रहा हूँ मै .

टूटता जा रहा हूँ मै .

-अनिल कुमार भ्रमर –

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9 Comments

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  4. Ramesh Singh - April 6, 2017, 9:11 pm

    बेहतरीन पंक्तिया

  5. JYOTI BHARTI - April 5, 2017, 7:00 pm

    Waah

  6. Sridhar - April 5, 2017, 10:58 am

    shaandaar

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