जो मन की बंजर धरती में फूल खिलाये तुम

जो मन की बंजर धरती में फूल खिलाये तुम,

टूटी मेरी हिम्मत को जो फिर से जागाये तुम,

बिखरे मेरे मन की चादर जो फिर से लगाये तुम,

उजड़ी हुई बगिया में भी जो सुगन्ध फैलाये तुम,

राहों के राही अनजाने को जो पहचाने तुम,

बेमेल शब्दों को मेरे जो अनमोल बताये तुम,

मेरे जीवन खण्डहर में जो रौशनी का दीप जलाये तुम।।

– राही (अंजाना)

Previous Poem
Next Poem
Spread the love

लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

7 Comments

  1. Neha Saxena - May 11, 2018, 9:50 pm

    Nyc

  2. Ravi Singh - May 12, 2018, 1:48 pm

    Waah

  3. Shruti - May 12, 2018, 2:49 pm

    Maja a gya

  4. Ujjwal - May 12, 2018, 10:11 pm

    Waah

  5. Baba - May 13, 2018, 9:17 am

    Nice

  6. Shakku Mathur - May 13, 2018, 9:48 am

    Sunder

  7. Madhyam Saxena - May 13, 2018, 9:58 am

    Nice

Leave a Reply